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नीतीश कुमार की मेहनत को कांग्रेस ने किया ‘हैक’, नेगेटिव पॉलिटिक्स के शिकार हो गए बिहार सीएम?

बेंगलुरु में मंगलवार को जो कुछ भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ हुआ, वह महागठबंधन के भीतर चल रही नकारात्मक राजनीति का आईना तो नहीं था? सवाल तो यह राजनीतिक गलियारों में उठने लगा है कि पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्षी एकता की मुहिम की जिसने नींव डाली और पटना की धरती पर 15 पार्टियों को एक सूत्र में पिरोया, उस नीतीश कुमार को बेंगलुरु में उपेक्षा का शिकार होना पड़ेगा? इतना तो मानना ही पड़ेगा कि बेंगलुरु में हुई महागठबंधन की बैठक से यह संदेश दे दिया गया कि भाजपा को जवाब राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस ही दे सकती है, कोई क्षेत्रीय दल नहीं।

बेंगलुरु में क्या हुआ?

पटना की बैठक के बाद कांग्रेस ने एक तरह से महागठबंधन की राजनीति को हैक कर लिया। और जो बैठक शिमला में होनी थी उसे बेंगलुरु शिफ्ट करा डाला। बताया जा रहा है कांग्रेस की तरफ से यह बयान भी आया कि बिहार की बैठक एक फॉर्मल बैठक थी। बेंगलुरु की बैठक कागजी तौर पर दुरुस्त और एक दिशा के ओर केंद्रित बैठक हुई। कांग्रेसी यहां भी नहीं रुके, और यह भी कह डाला कि मुंबई में होने वाली बैठक काफी महत्वपूर्ण बैठक होगी जो नीति, एजेंडे और मुद्दे भी तय करेगी। आश्चर्य तो तब हुआ जब महागठबंधन की बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में नीतीश कुमार को शामिल तक नहीं किया, जबकि नीतीश कुमार को संयोजक बनाने की बात थी। वह भी तब जब ममता बनर्जी और केजरीवाल जैसे नेताओं ने अपनी बात प्रेस कॉन्फ्रेंस में रखी।

भाजपा के आरोप में दम था?

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने एक बयान के जरिए राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को महागठबंधन के नेताओं के द्वारा अपमानित करने का आरोप लगा डाला। कांग्रेस शासित प्रदेश में नीतीश कुमार अनस्टेबल कहा। अपने अपमान के लिए नीतीश कुमार खुद दोषी हैं। कांग्रेस के विरुद्ध राजनीति की। लालू के जंगलराज के विरुद्ध राजनीति की और राजनीति के अंतकाल में उन्हीं के गोद में जा बैठे। अब तो जलालत झेलनी ही थी। हालत इस कदर नकारात्मक हुई कि प्रेस संबोधन में उन्हे बोलने के लिए उपयुक्त नहीं समझा।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

वरिष्ट राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ संजय कुमार कहते हैं कि बेंगलुरु में कांग्रेस बिग बॉस की तरह दिखी। ऐसा हर बार लगा कि कांग्रेस अपनी सुपरमैसी साबित कर रही है। शायद यह राष्ट्रीय पार्टी होने का अहसास था और क्षेत्रीय पार्टी के दबाव से मुक्त होना चाहती थी। वह एक अभियान में वह साथ तो है पर नीति निर्धारण में सहयोग लेगी, पर हावी होने नहीं देगी। नीतीश कुमार की उस सोच को जरूर झटका लगा होगा, जहां उनके प्रयास को निमित्त शुरुआत भर मानती है। इससे ज्यादा कुछ नहीं। मुंबई की बैठक में कांग्रेस कल्चर और भी हावी होगा।

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