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‘मैं मौत का इंतजार नहीं कर सकता’, घर के फ्रिज में रिसर्च कर पहले टेस्ट ट्यूब बेबी देने वाले ‘डॉक्टर’ के अंत की अनकही कहानी

1978 में जब इंग्लैंड में डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड और पैट्रिक स्टेपटो की निगरानी में दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ था। ठीक उसी समय भारत में डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय भी अपने घर के छोटे से फ्रिज में टेस्ट ट्यूब बेबी को जन्म दिलाकर एक निःसंतान दंपती की दुनिया में खुशियां लाने के प्रयास में जुटे थे। वे अपने दो सहयोगियों के साथ रिसर्च में जुटे थे। डॉ. सुभाष ने आईवीएफ प्रणाली से 3 अक्टूबर 1978 में एक बच्ची का जन्म कराया। नाम रखा गया ‘दुर्गा’। असली नाम कनुप्रिया अग्रवाल। यह दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी थी। इससे ठीक 67 दिन पहले रॉबर्ट और पैट्रिक की निगरानी में दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ था। एडवर्ड को इस सफलता के लिए 2010 में चिकित्सकों का नोबेल पुरस्कार दिया गया। लेकिन भारत को पहली टेस्ट ट्यूब बेबी देने वाले डॉ. सुभाष के साथ न्याय नहीं हो सका। जब डॉ. सुभाष ने जब दावा किया कि उन्होंने भारत को पहली टेस्ट ट्यूब बेबी को जन्म दिया है, तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। सरकारी नौकरी करने वाले डॉ. सुभाष को तंग किया गया, उनका तबादला कर दिया गया, ताकि वे शोध कार्य जारी नहीं रख सके। जांच कमेटी बनाकर उनके खिलाफ साजिश हुई, प्रताड़ित किया गया। अंत में भारत को पहले टेस्ट ट्यूब बेबी देने वाले डॉ. सुभाष ने फांसी के फंदे में लटक कर अपनी जान दे दी। 1981 में उनकी मौत हो गई। लेकिन उनकी मौत के छह साल बाद आईसीएमआर के निदेशक डॉ. आनंद ने डॉ. सुभाष के डायरी सहयोगियों से प्राप्त रिसर्च पेपर को देखकर दंग रह गए। डॉ. आनंद के प्रयास से ही अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा जगत ने 2003 में डॉ. सुभाष के कार्य को मान्यता दी।

डॉ. आनंद के प्रयास से डॉ. सुभाष के कार्यों को मिली मान्यता

वरिष्ठ पत्रकार अनुज सिन्हा बताते है कि डॉ. सुभाष ने आईवीएफ प्रणाली से 3 अक्टूबर 1978 में एक बच्ची का जन्म कराया। लेकिन तब की सामाजिक परिस्थिति ऐसी नहीं थी कि ‘दुर्गा’ के माता-पिता सामने आकर इस बात को स्वीकार करते। वहीं टेस्ट ट्यूब बेबी पर रिसर्च के लिए डॉ. सुभाष के पास कोई साधन नहीं थ। अपने फ्लैट को ही उन्होंने प्रयोगशाला बना दिया था। डॉ. सनीत मुखर्जी और डॉ. सरोज कांति भट्टाचार्य उनके सहयोगी थे। टेस्ट ट्यूब बेबी के जन्म के लिए कई प्रयोगों से गुजरना पड़ता है। डॉ. सुभाष ने इसके लिए सामान्य उपकरण और रेफ्रिजेरेटर का भी उपयोग किया था। कोई भी मानने को तैयार नहीं था कि इतने सामान्य उपकरण से इतना बड़ा रिसर्च हो सकता है। डॉ. सुभाष की मौत के बाद उनकी पत्नी नमिता मुखर्जी के पास डायरी के कुछ पन्ने थे। उनके दोनों सहयोगी के पास भी जानकारियां थीं। डॉ. सुभाष की मौत के पांच साल बाद 1986 में मुंबई में डॉ. टीसी आनंद की निगरानी में हर्षा नामक एक बच्ची का जन्म हुआ। देश ने उसे पहले टेस्ट ट्यूब बेबी के तौर पर मान्यता दे दी। यह माना गया कि डॉ. डॉ. टीसी आनंद ही भारत में पहले टेस्ट ट्यूबी बेबी के जनक हैं। डॉ. आनंद आईसीएमआर के निदेशक भी थे। वे डॉ. सुभाष की मौत के 17 साल बाद 1997 में एक सेमिनार के सिलसिले में कोलकाता आए। इस दौरान डॉ. सुभाष के पुराने सहयोगी और उनके मित्रों ने डॉ. आनंद से मुलाकात कर सुभाष की डायरी और रिसर्च पेपर दिखाया। उन्होंने पेपर का अध्ययन किया और दंग रह गए। डॉ. आनंद ने महसूस किया कि डॉ. सुभाष के साथ अन्याय हुआ है। देश में पहले टेस्ट ट्यूब बेबी के जनक होने का दावा डॉ. सुभाष का दावा गलत नहीं था। असली हकदार डॉ. सुभाष थे। इसके बाद डॉ. आनंद ने खुद अभियान चलाया कि पहले टेस्ट ट्यूब बेब के जन्म का श्रेय उन्हें नहीं, डॉ. सुभाष को मिले। डॉ. आनंद के प्रयास को सफलता मिली। 2003 में मेडिकल साइंस ने डॉ. सुभाष के कार्य को मान्यता दी। वहीं पहली टेस्ट ट्यूब बेबी दुर्गा यानी कनुप्रिया भी सामने आ गई। उनके पिता भी सामने आ गए। डॉ. सुभाष की ओर से किए गए कार्य को बताया। लेकिन डॉ. टीएन आनंद कुमार के कारण ही डॉ. सुभाष को इसका श्रेय मिल पाया।

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