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फ्रांस को खेती सीखा रहे बिहार के किसान, शिवहर में देसी तकनीक सीखने पहुंचे विदेशी

बिहार में देसी तकनीक से होने वाली खेती विदेशियों को भी खूब भा रही है। विदेशों में भी बिहार की देसी तकनीक के आधार पर खेती शुरू की जायेगी। यह कोई बनावटी बात नहीं, बल्कि सच्चाई है। यह जानकर ताजुब्ब और थोड़ी देर के लिए हैरानी होगी कि फ्रांस के दो शोधार्थी हाल में शिवहर जिला पहुंची थी और यहां से खेती की देसी तकनीक सीख कर लौटी हैं। उन्होंने ये सीखा कि रासायनिक खाद के बिना कैसे बेहतर खेती और अच्छी पैदावार हासिल की जाती है। बहरहाल, ये बड़ी बात है कि शिवहर जिला में खेती की जो तकनीक है, वह विदेशों में भी प्रचलित होगा।

चार दिन तक तकनीक की सीख ली

प्राकृतिक खेती को केंद्रीय कृषि मंत्रालय से चयनित जयकली कुंवर मेमोरियल ट्रस्ट, शिवहर में जैविक खेती की जानकारी लेने के लिए फ्रांस की शोधार्थी मिस लौहा यहां आई थी। वह 21-24 सितंबर तक श्रीअन्न की खेती, जैविक खाद निर्माण एवं बागवानी के अलावा स्कूलों में विकसित हो रहे किचन गार्डन की जानकारी लेकर शिवहर से लौटी हैं। दो माह पूर्व फ्रांस की ओपोलिन भी यहां आई थीं। यहां की तकनीक को ये शोधार्थी फ्रांस में प्रस्तुत कर रही हैं। फ्रांस की इन दोनों शोधार्थी से पहले ट्रस्ट की गतिविधियों के बारे में जानना जरूरी है।

ट्रस्ट का कार्य एवं खेती में उसकी भूमिका

मिलेट्स की खेती के लिए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने देशभर में 261 संस्थाओं को यह जिम्मेदारी सौंपी है। इनमें जयकली कुंवर मेमोरियल ट्रस्ट भी शामिल है। यह संस्था शिवहर में बायो रिसोर्स सेंटर की भी शुरुआत कर चुकी है। सीतामढ़ी में चार, मुजफ्फरपुर में एक तथा शिवहर में तीन और सेंटर खोलने की तैयारी है। यह ट्रस्ट पिछले पांच वर्षों से शिवहर समेत बिहार के कई जिलों में प्राकृतिक और जैविक खेती पर काम कर रहा है। देसी तकनीक के बदौलत बेहतर उत्पादन कर रहा है।

अब संस्था को श्रीअन्न खेती का जिम्मा

अब इस संस्था को केंद्र सरकार ने श्रीअन्न की खेती के लिए लोगों को जागरूक करने जिम्मा दिया है। संस्था के कार्य इंटरनेट मीडिया के जरिए विदेशों तक पहुंच रहा है। ट्रस्ट के संस्थापक राइडर राकेश बताते है कि केंद्र सरकार उत्तर बिहार की एकमात्र जयकली कुंवर मेमोरियल ट्रस्ट को जैविक खेती के लिए जागरूकता की जिम्मेवारी सौंपी है। यह संस्था पिछले चार वर्षों से शिवहर, सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर जिले में जलवायु सापेक्ष प्राकृतिक खेती के प्रोत्साहन के लिए निरंतर प्रयासरत है।

जेकेएमटी से जुड़े है सैकड़ों किसान

जेकेएमटी की ओर से मोटे अनाजों की खेती के लिए भी कृषकों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। फिलहाल शिवहर और सीतामढ़ी जिले के सैकड़ों किसान जेकेएमटी से जुड़े हैं। शिवहर जिले के कुल तीन स्कूलों में पुनर्नवा पोषण वाटिका के जरिए बच्चों को जलवायु संकट की चुनौतियों से निबटने के उपायों के साथ-साथ विभिन्न विषयों पर गतिविधियों का संचालन भी किया जा रहा है। संस्था के कृषि फार्म में बगैर रासायनिक खाद के ही बेहतर उपज की जानकारी दी जा रही है। उन्होंने कहा कि यह हमारे लिए गौरव की बात है कि विदेश से भी लोग देसी खेती की तकनीक सीखने शिवहर जैसे छोटे से इलाके में आ रहे है।

फ्रांस में किसानों को प्रेरित करेंगी शोधार्थी

शिवहर प्रवास के दौरान पेरिस (फ्रांस) की प्रमुख एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी सैकले की शोधार्थी और पेरिस शहर की रहने वाली मिस लौहा ने तरियानी छपरा और आसपास के इलाकों का भ्रमण किया। राकेश राइडर के साथ इलाके के किसानों से बात की। रासायनिक खाद के बिना कैसे खेती की जाती है, की जानकारी ली। स्कूलों में जाकर बच्चों से मुलाकात की। महिलाओं के साथ बैठक की। यहां केले के पत्ते पर भोजन किया। इस दौरान मिस लौहा ने कहा कि वह देसी खेती की तकनीक ही नहीं, बल्कि यहां से ज्ञान और संस्कार लेकर फ्रांस जा रही है। वह यहां की तकनीक से फ्रांस के किसानों को खेती के लिए जागरूक करेगी। यहां मिली जानकारी, ग्रामीणों के स्नेह व सहयोग से भाव विभोर थी।

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