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परमीना के बच्चे को दूध, मणिपुर को मलहम चाहिए, फ्लाइंग किस पर चर्चा नहीं

सबसे पहले मेवात से आई कुछ खबरों का जिक्र करते हैं। 27 साल की परमीना अपने दूधमुंहे बच्चे जीशान को क्या पिला रही है? बोतल दूध का है लेकिन पानी में चीनी मिलाकर उसकी भूख शांत कर रही है। ऐसा क्यों हुआ? आप सोच रहे होंगे नूह के दंगों में बर्बाद हो गई। नहीं, ऐसा नहीं है। परमीना का घर तो दंगों के बाद पांच अगस्त को बर्बाद हुआ। हरियाणा सरकार के बुलडोजर से। अपने अस्सी साल की सास फजरी के साथ थी जब बुलडोजर पहुंचा। मिन्नतें बहुत हुईं लेकिन सामान निकालने का मौका तक नहीं मिला। वो बूढ़ी सास के साथ सिर्फ चारपाई निकाल पाई। खैर, कोर्ट ने अब बुलडोजर पर ब्रेक लगा दिया है। दूसरी खबर टिगरा गांव से। वहीं गांव जहां महापंचायत हुई और मुसलमानों से सामान नहीं खरीदने की अपील जारी हुई। जिसके खिलाफ कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हुए हैं। लेकिन गंगा जमुनी संस्कृति की ताकत देखिए। यहां के कपिल गुज्जर के पास 500 कच्चे मकान हैं। अधिकतर मुसलमान किराएदार हैं। लेकिन वो किसी हाल में उन्हें जाने देना नहीं चाहते और उनकी रक्षा की कसम खाते हैं। तीसरी खबर। खांडसा में उस मजार को उजाड़ दिया जहां हिंदू-मुसलमान सभी दुआ मांगने जाते थे। इसका नाम है पीर बाबा मंदिर। पीर भी और मंदिर भी।

अब मणिपुर की ओर चलते हैं। जहां अर्धसैनिक बलों से लूटे गए हथियारों से मोर्टार चलाए जा रहे हैं। 150 लोगों की मौत के बाद भी मैतेई और कुकी एक दूसरी की जान के प्यासे हैं। तीन मई से धधकी हिंसा की आग थमने का नाम नहीं ले रही। इस मसले पर चर्चा नहीं हुई तो अविश्वास प्रस्ताव का हथियार विपक्ष ने उठा लिया। संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर जोरदार बहस जारी है। संख्याबल हमें मालूम है। हश्र क्या होगा? ये तय है। नरेंद्र मोदी सरकार के पास 331 सांसदों का सपोर्ट है और राहुल गांधी की अगुआई में बने गठबंधन INDIA के पास महज 144 सदस्यों का समर्थन है। फिर अविश्वास प्रस्ताव आया क्यों? मणिपुर पर प्रधानमंत्री का मुंह खुलवाने के लिए। ऐसा विपक्ष कहता है। सत्ता पक्ष का कहना है कि विरोधी दलों के बीच आपस में कितना विश्वास है ये देखने के लिए प्रस्ताव आया है। लेकिन मणिपुर पर माहौल गर्म होने के बाद मेवात भी जल उठा। मणिपुर और हरियाणा दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। डबल इंजन का नारा लगाने वाली पार्टी दूसरे इंजन को कैसे छोड़ सकती है? ये कैसे कह सकते हैं कि राज्यों के मामले पर मोदी सरकार से सफाई क्यों?

हम इस पचड़े में नहीं पड़ते कि मणिपुर में हिंसा किसने शुरू की और मेवात में दंगे किसने शुरू किए। दोनों के कारण हमें पता है। बृजमंडल जलाभिषेक यात्रा पर हमला हुआ तो दंगे भड़के। उधर कुकियों और मैतेई के बीच लंबे समय से बनाई गई नफरत की खाई मणिपुर हाई कोर्ट के फैसले से इतनी चौड़ी हो गई कि आग लग गई। फैसला था मैतेई को एसटी का दर्जा देने का। दोनों राज्य सुलगे तो पानी डालने का काम कौन करेगा? हमारी चुनी हुई सरकार। और राज्य सरकारें फेल हो जाएं तो ये काम कौन हाथ में लेगा? केंद्र सरकार। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या कर रहे हैं? दो महिलाओं को नंगा कर गैंग रेप करने के मामले में जो गुस्सा उन्होंने दिखाया उसके बाद क्या किया? क्या एसपी-कलेक्टर के तबादले से काम चल जाएगा? नरेंद्र मोदी फैक्टर के कारण ही तो इन दोनों राज्यों के लोगों ने वहां भाजपा की सरकार बनाई। फिर इस फैक्टर का फर्ज है न कि वो लोगों के लिए एक्शन में दिखें। शायद 10 अगस्त को दिखें क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव पर जवाब तो देना होगा। कुछ लोग ये कह रहे कि इसी जवाब से वो 2024 चुनाव का टोन सेट करेंगे। ठीक है। कर लें। अभी तो प्रधान सेवक की भूमिका दिखाएं।

सवाल विपक्ष का नहीं है। राहुल गांधी का नहीं है। देश की आंतरिक सुरक्षा का है। अव्यवस्था का है। ये सवाल तो विपक्ष के अलावा सुप्रीम अदालत भी पूछ रही है। हरियाणा और मणिपुर दोनों ही मामलों में अदालतों की टिप्पणी मोदी सरकार के लिए शर्मिंदगी है। पहले मणिपुर पर की गई टिप्पणी पांच पॉइंट्स से समझिए

1. संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्य में संवैधानिक मशीनरी पूरी तरह ध्वस्त हो गई है।
2. कानून-व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण से बाहर है।
3.महिलाओं के गैंगरेप के बाद दर्ज एफआईआर से पता चलता है कि जांच में कोताही बरती गई और बहुत देर की गई।
4. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा – मई से लेकर जुलाई तक कानून नाम की चीज ही नहीं थी।
5.केंद्र सरकार बिना देरी किए कार्रवाई करे नहीं तो सुप्रीम कोर्ट चुप नहीं बैठेगी।

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