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कोचांग गैंगरेप केस में दोषी को हाईकोर्ट से राहत नहीं.

सजा के खिलाफ दायर जमानत याचिका कोर्ट ने खारिज की.

रांची में वर्ष 2018 के चर्चित कोचांग गैंगरेप मामले में एक अहम न्यायिक फैसला सामने आया है। खूंटी जिले से जुड़े इस मामले के सजायाफ्ता अजूब सांडी पूर्ति को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। सजा के खिलाफ दाखिल उसकी क्रिमिनल अपील पर अदालत ने सुनवाई की। सुनवाई के दौरान आरोपी की जमानत याचिका पर विस्तार से बहस हुई। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयान को गंभीरता से देखा। न्यायमूर्ति रंजन मुखोपाध्याय की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने पाया कि आरोपी की पहचान पीड़िता ने स्पष्ट रूप से की थी। टीआईपी और ट्रायल के दौरान पहचान को महत्वपूर्ण आधार माना गया। इसी आधार पर जमानत देने से इनकार किया गया। अदालत ने अपराध की गंभीरता को भी ध्यान में रखा।

राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता भोला नाथ ओझा ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि मामले में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की दलीलों को स्वीकार किया। न्यायालय ने कहा कि आरोपी की भूमिका गंभीर अपराध से जुड़ी है। इसलिए उसे राहत देना उचित नहीं होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि के बाद जमानत दुर्लभ परिस्थिति में ही दी जाती है। इस मामले में ऐसी परिस्थिति नहीं पाई गई। सुनवाई के बाद जमानत याचिका खारिज कर दी गई। इससे पीड़ित पक्ष को राहत मिली। मामला लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया में चल रहा है।

यह घटना जून 2018 की है जब खूंटी जिले में पत्थलगड़ी आंदोलन चल रहा था। एक एनजीओ से जुड़ी पांच महिलाएं जागरूकता अभियान के तहत कोचांग गांव पहुंची थीं। वहां नुक्कड़ नाटक के दौरान उन्हें अगवा कर लिया गया। बाद में उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। इस घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया था। निचली अदालत ने फादर अल्फांसो को साजिशकर्ता माना था। 17 मई 2019 को सभी दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। अन्य दोषियों में जॉन जुनास तिडू और बलराम समद शामिल थे। बाजी समद उर्फ टकला, जोनास मुंडा और अजूब सांडी पूर्ति भी दोषी पाए गए थे। अब हाईकोर्ट के फैसले से सजा बरकरार रहने का रास्ता मजबूत हुआ है।

 

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