झारखंड हाईकोर्ट ने लगभग 25 साल पुराने बिजली चोरी मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। यह फैसला न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने दिया। अदालत ने एकल पीठ के पूर्व आदेश को रद्द कर दिया। पहले दिए गए आदेश में बिजली विभाग को राशि लौटाने को कहा गया था। उषा मार्टिन लिमिटेड को पांच करोड़ रुपये वापस करने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ सात दशमलव पांच प्रतिशत ब्याज भी जोड़ने को कहा गया था। इस आदेश के खिलाफ बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड ने अपील की थी। अपील पर सुनवाई के बाद खंडपीठ ने नया फैसला सुनाया। अदालत ने मामले में प्रक्रिया संबंधी त्रुटियां पाई। इसलिए पुराने आदेश को टिकाऊ नहीं माना गया।
एकल पीठ ने वर्ष 2025 में कंपनी की याचिका स्वीकार की थी। उस फैसले में बिजली बोर्ड को राशि लौटाने का निर्देश दिया गया था। लेकिन खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान दिया। तकनीकी विशेषज्ञ एस.एन. द्विवेदी की रिपोर्ट पर भरोसा किया गया था। यह रिपोर्ट संबंधित पक्ष को उपलब्ध नहीं कराई गई थी। अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया। इसी आधार पर 4 सितंबर 2025 का आदेश रद्द किया गया। साथ ही 4 अगस्त 2001 के अधिनिर्णायक आदेश को भी निरस्त कर दिया गया। अदालत ने मामले की दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया।
खंडपीठ ने झारखंड स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के चेयरमैन को नया अधिनिर्णायक नियुक्त किया। उन्हें तीन महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। सभी दस्तावेजों और तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर फैसला होगा। यह मामला वर्ष 2000 से जुड़ा हुआ है। उस समय बिजली चोरी के आरोप में कंपनी की बिजली काट दी गई थी। बिजली बोर्ड ने लगभग 40.39 करोड़ रुपये का अस्थायी बिल जारी किया था। कंपनी ने इस कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी थी। बिजली बहाल करने के लिए पांच करोड़ रुपये जमा कराए गए थे। साथ ही 15 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी दी गई थी। अब मामले की सुनवाई फिर से नए सिरे से होगी।



