झारखंड में हेमंत से मिल कर नीतीश विपक्षी एकता का मंत्र दे गए या जेडीयू का जनाधार बढ़ाने की मुहिम छेड़ गए !
विपक्षी एकता के प्रयास में जुटे बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने पड़ोसी सूबे झारखंड के मुख्यमंत्री से भी मुलाकात कर ली। अपना संकल्प और इरादा भी बता दिया कि कुर्सी के लिए वह कोशिश नहीं कर रहे। बीजेपी देश की सत्ता से हटाना उनका मकसद है। हेमंत सोरेन ने न सिर्फ उनका आवभगत किया, बल्कि यह भी सार्वजनिक कर दिया कि नीतीश जी उनके गार्जियन हैं। इसलिए उनके प्रस्ताव के खिलाफ जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार भले दूसरे प्रदेशों में जेडीयू की जगह बनाने का प्रयास नहीं कर रहे हों, लेकिन झारखंड में वह अपनी पार्टी जेडीयू को पुनर्जीवित करना चाहते हैं।एकता के साथ जेडीयू को पुनर्जीवित करना भी मकसदवाम दलों को छोड़ दें तो झारखंड में विपक्षी एकता तो पहले से ही बनी हुई है। बिहार की तरह झारखंड में भी महागठबंधन की सरकार है। हेमंत सोरेन के नेतृत्व में चल रही सरकार में जेएमएम के साथ कांग्रेस और आरजेडी तो पहले से ही शामिल हैं। एक-दो वामपंथी विधायक हैं भी तो वे सरकार के साथ ही अक्सर ही कदमताल करते दिख जाते हैं। हां, घोषित तौर पर वे सरकार के साथ नहीं हैं। जेडीयू का कोई विधायक ही नहीं है। हालांकि विभाजन के बाद बिहार से अलग बने झारखंड में पहले जेडीयू का खासा जनाधार था। जेडीयू को पुनर्जीवित करने के क्रम में ही नीतीश कुमार ने जेडीयू कोटे से झारखंड के खीरू महतो को राज्यसबा भेजा है। यानी विपक्षी एकता के साथ वे अपनी पार्टी का खोया जनाधार फिर से हासिल करना चाहते हैं। हेमंत सोरेन से नीतीश कुमार की मुलाकात के पहले जेडीयू के बड़े नेता राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह और झारखंड के प्रभारी अशोक चौधरी भी हफ्ते भर के अंदर झारखंड का दौरा कर चुके हैं।
बाबूलाल मरांडी की सरकार में जेडीयू कोटे के 4 मंत्री थे
बिहार से अलग होकर साल 2000 में झारखंड बना था। तब झारखंड में जेडीयू के 9 विधायक थे। उनमें 4 मरांडी के मंत्रिमंडल में मंत्री भी बने थे। लालचंद महतो, मधु सिंह, रमेश सिंह मुंडा और रामचंद्र केसरी जेडीयू कोटे से मंत्री बनाए गए थे। उसके बाद से जेडीयू धीरे-धीरे झारखंड में अपना जनाधार खोता गया। नीतीश कुमार के ’तीर’ का हर बार निशाना चूकता रहा। 2014 के बाद से तो लगातार जेडीयू शून्य पर आउट होती रही है। 2019 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने एक बार फिर कमर कसी और 40 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। सभी सीटों पर बुरी तरह से हार हुई। अधिकतर सीटों पर जेडीयू के उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। जेडीयू के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष सालखन मुर्मू भी कामयाब नहीं हो पाए।
एकता प्रयास में श्रडड के लिए धर्म संकट पैदा करेगा जेडी
यूकांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की सलाह पर ही नीतीश कुमार एकता मुहिम में जुटे हैं। अगर एकता बन जाती है तो जेएमएम के सामने सबसे बड़ा धर्म संकट जेडीयू ही पैदा करेगा। झारखंड में अपनी जमीन रहे तलाश रहे नीतीश कुमार सीटों में यकीनन हिस्सेदारी का सवाल उठाएंगे। ऐसे में जेएमएम के सामने संकट यह पैदा होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव की तरह वह कांग्रेस को उसकी हिस्सेदारी बरकरार रखे या उसके हिस्से से सीटें काट कर जेडीयू को एकोमोडेट करे। शायद यही वजह रही कि झारखंड में जेएमएम नेता हेमंत सोरेन से नीतीश की मुलाकात के दौरान कांग्रेस ने दूरी बना ली थी। नीतीश या पहले आ चुके उनके बड़े नेताओं ने भी कांग्रेस के किसी नेता से मिलना उचित नहीं समझा। यह भी हो सकता है कि नीतीश इसे जरूरी नहीं समझ रहे हों, क्योंकि उनकी बातचीत तो सोनिया, राहुल और मलिल्कार्जुन खरगे से तो हो ही चुकी है।




