इस एनकाउंटर के बाद एक साथ 18 पुलिस वालों को उम्रकैद हुई, उसके बाद राज्य में अब तक किसी ने नहीं सुनी ‘गोलियों की गूंज’

कहीं की पुलिस किसी भी वजह से एनकाउंटर क्यों न करें उसको लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं. इतना ही नहीं हंगामे के बाद कई मामलों में सीबीआई तक जांच पहुंचती है. अधिकांश मामलों में मानवाधिकार एनकाउंटर काफी चर्चित रहे हैं. विकास दुबे मामले में तो पहले से ही कहा जा रहा था कि उसका एनकाउंटर होगा. हुआ भी वही. यही वजह है कि इनकाउंटर को सरकारी कत्ल कहा जाता है. जांच में एनकाउंटर को गलत पाए जाने पर कई पुलिसकर्मियों को सजा भी मिल चुकी है. एक एनकाउंटर में पुलिस वालों को ऐसी सजा मिली कि उस राज्य में फिर कभी पुलिस वालों ने निर्दोषी की तो छोड़िए बदमाशों गैंगस्टर व माफियाओं तक की एनकाउंटर करने की हिम्मत हिम्मत नहीं कर पाए. यहां तक कि वहां के लोगों को उस घटना के बाद एनकाउंटर के गोलियों की गूंज सुनाई नहीं दी.
पहली बार 18 पुलिसकर्मियों को उम्र कैद की मिली सजा
इस बीच सीबीआई ने जांच शुरू कर दी. सीबीआई ने चार जून 2014 को लोकल अदालत में चार्जशीट दाखिल की. अपनी जांच में सबूतों के साथ सीबीआई ने देहरादून के 18 पुलिसकर्मियों को रणबीर की हत्या का दोषी माना. साथ ही कहा कि हत्या जान बूझकर और प्रायोजित हत्या है. छह जून 2014 को अदालत ने सभी 18 कैदियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. इसके बाद उत्तराखंड ही नहीं देशभर के पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. दोषी पुलिसकर्मियों ने इसके खिलााफ दिल्ली हाईकोर्ट में रिट दायर की. दिल्ली हाईकोर्ट ने 18 में 11 को डायरेक्ट हत्या में शामिल न होने के सबूते के आधार पर सजा से बरी कर दिया. वहीं सात लोगों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी. दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई सुप्रीम कोर्ट पहुंची. सीबीआई ने शीर्ष अदालत में दावा किया है कि दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला गलत है. इस मामले में निचली अदालत का फैसला सही है. सभी 18 दोषी पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा मिलनी चाहिए. रणबीर सिंह के पिता का भी कहना है कि उनके बेटे की हत्या पुलिस की वर्दी पर कलंक है, इसलिए 18 पुलिकर्मियों को सजा न मिलना उनके साथ अन्याय होगा. फिलहाल, 2009 के इस एनकाउंटर का नतीजा यह निकला कि उत्तराखंड में उसके बाद से अभी तक कोई एनकाउंटर वहां की पुलिस करने का साहस अभी तक नहीं जुटा पाई है.



