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कोई देने चला था जान, किसी ने लगाई दुकान, भावुक कर देगी ‘खतरों के खिलाड़ी 13’ के कंटेस्टेंट्स की दास्तां

स्क्रीन पर सांप-कीड़े-मकौड़ों से जूझने और ऊंचाई से पानी में कूदने जैसे खतरों से खेलना और बात है, पर सच्चा खिलाड़ी वो है, जो असल जिंदगी में ऊपरवाले की दी हुई चुनौतियों को पार करके विजेता की तरह उभरे। ऐसे में, हमने टीवी के चर्चित रिएलिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी 13’ में अपना दमखम दिखाने पहुंचे ऐक्टर्स से जानी, उनके रियल लाइफ के सबसे खतरनाक यानी मुश्किल दौर और उससे लड़कर विजेता बनने की कहानी।

डैड के गुजरने पर मैं अचानक जिम्मेदार हो गई: डेजी शाह

मेरी जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर वो था, जब मैंने अपने डैड को खोया था। तब अचानक से सारे घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। वहां से मैंने अपने काम को बहुत गंभीरता से लेना शुरू किया, क्योंकि मुझे तब एक जिम्मेदारी का अहसास हो गया था। वहां से मैं यहां तक पहुंची हूं। हालांकि उस मुश्किल दौर में भी मेरे पापा ही मेरी प्रेरणा रहे। वह हमेशा मुझे कहते थे कि बेटा कुछ भी करो, हमेशा मेरा नाम रोशन करना। ये बात हमेशा मेरे जेहन में रहती है और उसी बात लेकर मैं आगे बढ़ती रही हूं।

खाने तक के पैसे न थे, तब जान देने चली थी: अर्चना गौतम

मैंने बहुत मुश्किल वक्त देखा है, लेकिन मेरा सबसे मुश्किल दौर तब था, जब लॉकडाउन में मेरे पास दूध तक के पैसे नहीं थे, घर का किराया देने तक के पैसे नहीं थे। मेरा मकान मालिक बहुत परेशान करता था कि किराया दे दो, नहीं तो तुम्हारा सामान फेंक दूंगा। तब मैंने इतनी निराश हो गई थी कि मैं अपनी जान देने चल पड़ी थी। मैं ऊंचाई पर जाकर खड़ी भी हो गई थी, मगर तभी मैं अपनी मम्मी के बारे में सोचकर मैं रुक गई। दरअसल, मेरे दिमाग में ऐसी चीजें भी भर दी गई थीं कि कोविड में सब ऐसे ही रहने वाला है, दुनिया खत्म होने वाली है, उस पर मेरे पास न पैसे थे न कुछ काम, तो मैं जीना ही नहीं चाहती थी, लेकिन मैं आज जो हूं, उसका श्रेय रवि किशन जी को देना चाहूंगी, जो एक रिएलिटी शो के दौरान मुझे गांव से उठाकर मुंबई लेकर आए थे। अगर वो नहीं लेकर आते तो इस अर्चना को कोई नहीं जान पाता।

बारिश में टपकती छत के नीचे सोकर सपने देखे हैं: शिव ठाकरे

मेरी तो जिंदगी का सारा सफर ही मुश्किलों से भरा रहा है, लेकिन सच्ची कहूं तो मैं उसके लिए भगवान का शुक्रिया करता हूं, क्योंकि अगर वे चुनौतियां ना होती, अगर पहले से सब सुख-सुविधाएं होती, तो मैं आज शिव ठाकरे नहीं होता। जब आप अपने सपने के पीछे भागकर उसे पूरा करते हैं, खुद अपनी पहली बाइक या कार खरीदते हैं, अपने पैसे से घर लेते हैं, तो उसकी बात ही कुछ और होती है। मैं पांचवीं-छठी क्लास में था, जब इतनी समझ भी नहीं होती है, तब मैं मेले में दुकान लगाकर घर के लिए पैसे कमाता था और अपनी पॉकेट मनी भी खुद कमाता था, लेकिन मैं कभी उसका रोना नहीं रोता था कि हाए, ये सब मेरे साथ ही क्यों हुआ। मैं तब भी मौज-मस्ती से जीता था। जब बारिश में मेरे घर की छत बहती थी, तो दीदी, पापा, मम्मी, तीनों मिलकर बाल्टी लगाकर पानी घर से फेंकते थे पर मैं मस्त सोता था। मैंने उन हालातों में भी मजे से जिंदगी जी है। ये मेरा नेचर है और उसी में मुझे आज यहां तक पहुंचाया है।

तब पूरे साल में सिर्फ 9 दिन काम मिला था: रोहित रॉय

अपनी निजी जिंदगी की बात करूं, तो मेरे पिता जी का देहांत मेरी जिंदगी का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था, क्योंकि तब मैं सिर्फ 14-15 साल का था और एकदम से उनका देहांत हो गया, वो बीमार भी नहीं थे और मैं अपने पिता जी से बहुत करीब था, इसलिए वो मेरे लिए बड़ा सदमा था। वहीं, करियर वाइज बोलूं, तो साल 2014 में एक दौर आया था, जब मेरे पास बिल्कुल काम नहीं था। पूरे साल में मैंने सिर्फ 9 दिन काम किया था। एक एनकाउंटर करके शो किया था 9 दिन के लिए, उसके अलावा और कोई काम नहीं मिला। वो बहुत बुरा दौर था मेरे लिए। तब सलमान खान से मुलाकात हुई तो उसने बताया कि मेरे भी करियर में ऐसा एक दौर आया था, जब मेरे पास भी काम नहीं था तब मेरे पास दो विकल्प थे या तो मैं शराब में डूबकर अपना गम गलत करता या फिर मैं जिम जाकर खुद को फिट करता। फिर मैंने भी वही किया, अपने को फिट किया और 2015 में मैंने रितिक रोशन के साथ फिल्म काबिल साइन की और सब कुछ बदल गया।

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