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क्यों झारखंड का गिरिडीह अब नक्सल का गढ़ नहीं रहा?

कभी नक्सलवादियों का सबसे सुरक्षित ठिकाना माने जाने वाले पारसनाथ में सुरक्षा बलों का दावा है कि अर्धसैनिक बलों और पुलिस के संयुक्त अभियान के कारण नक्सलियों को हाशिए पर धकेल दिया गया है।

सुरक्षा बलों का कहना है कि नक्सलियों को या तो मार दिया गया या पकड़ लिया गया, जबकि बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया है। अब स्थिति यह है कि संगठन में उच्च पदों पर बैठे यहां के निवासी भी इस क्षेत्र से भाग गए हैं। दूसरी ओर, गिरिडीह के एसपी डॉ. बिमल कुमार, सीआरपीएफ कमांडेंट और एएसपी अभियान सुरजीत के नेतृत्व में पुलिस और अर्धसैनिक बल क्षेत्र में लगातार तलाशी अभियान चला रहे हैं। इन कार्रवाइयों के दौरान, पारसनाथ क्षेत्र में नक्सलियों द्वारा छिपाए गए हथियारों का एक बड़ा जखीरा बरामद किया गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि नक्सलियों को पहले भी पकड़ा गया था, लेकिन 2015 के बाद नक्सलवाद पर एक बड़ा प्रहार हुआ। प्रशांत बोस की गिरफ्तारी एक बड़ी सफलता थी। इसके अतिरिक्त, 2018 में 15 नक्सलियों की गिरफ्तारी और कई “गुमराह” लोगों का मुख्यधारा में लौटना भी नक्सल प्रभाव को कम करने में सहायक रहा है। शीर्ष नक्सलियों के पकड़े जाने या मारे जाने और पारसनाथ और झुमरा जैसे क्षेत्रों में सफल अभियानों के कारण गिरिडीह अब पहले जैसा नक्सल का गढ़ नहीं रहा।

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