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राजीव गांधी का आखिरी दांव: छह साल के छात्र आंदोलन का अंत.

1984 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो उन्हें कई संकटों का सामना करना पड़ा, जिनमें से असम का मुद्दा भी एक था।

बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के लिए छात्र आंदोलन एक बड़ी चुनौती बन गया था। ऐसे में देखते हैं कि कैसे राजीव गांधी ने भारत में छह साल से चल रहे एक हिंसक छात्र आंदोलन को, जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई थी, चतुराई से खत्म किया।

असम में छह साल तक चला छात्र आंदोलन काफी उग्र हो गया था। 800 से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे और बंगालियों के नरसंहार की खबरें सुर्खियां बन रही थीं। राजीव गांधी ने नए प्रधानमंत्री बनते ही इस गंभीर मुद्दे को हल करने की दिशा में तेजी से काम किया।

दरअसल, 15 अगस्त, 1985 की मध्यरात्रि को असम समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। प्रधानमंत्री ने आखिरी समय में छात्र नेताओं पर दबाव बनाकर इस समझौते तक पहुंचने में कामयाबी पाई। हालांकि, इस समझौते के बारे में कई तरह के सवाल उठे और बाद में इसे लेकर राजनीतिक विवाद भी हुए।

राजीव गांधी के इस कदम ने असम में एक लंबे संघर्ष को खत्म किया और शांति की शुरुआत की। हालांकि, इस मुद्दे के कई पहलू आज भी जटिल बने हुए हैं।

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