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झारखंड के इन खेतों में काम के बदले कैश नहीं लेते मजदूर… यहां की इकोनॉमी जान हिल जाएंगे

देश-दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्था जब पूरी तरह से ‘मुद्रा’ पर निर्भर है, इस दौर में भी झारखंड के कई गांवों की परंपरा एकदम अलग है। आदिवासी बहुल कई गांवों में अब भी धान की रोपनी और कटाई के वक्त मजदूरी का भुगतान नहीं करना पड़ता है। इन गांवों में ‘लेबर मार्केट’ का कोई स्थान नहीं होता है। बल्कि आपसी सहभागिता के आधार पर खेती-किसानी और अन्य कामों को किया जाता है। जनजातीय आबादी वाले इन गांवों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था ‘मॉर्केट इकोनॉमी’ पर निर्भर नहीं है। गांव-परिवार में लोग खुद ही सारी अनाज, दलहन और तेलहन फसलों-सब्जियों का उत्पादन करते हैं। अपने घर-परिवार की जरूरत के मुताबिक उसे रख लेते है, जबकि अतिरिक्त बचे अनाज-सब्जियों को शहरों में बेच कर अन्य कुछ आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी करते हैं।

आदिवासी गांवों में खेती अब भी आपसी सहभागिता पर निर्भर

रांची स्थित डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के निदेशक डॉ. रणेंद्र बताते हैं ट्राइबल इकोनॉमी अब भी कृषि आधारित होने के साथ आपसी सहभागिता पर निर्भर है। उन्होंने बताया कि झारखंड के गांवों में अब भी मेहमानी प्रथा (आतिथ्य सत्कार) का काफी महत्व है। फसल कटने के बाद लोग अपने अतिरिक्त उत्पादन को लेकर रिश्तेदारों के यहां पहुंचते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि उस फसल की जरूरत उसके रिश्तेदारों को है। वहीं लौटते समय वे अपने रिश्तेदारों के यहां उपजे अतिरिक्त फसल को साथ लेकर लौटते हैं। इससे दोनों परिवारों की जरूरतें पूरी हो जाती है। इसी तरह से जब खेती का समय आता है, तो गांव-परिवार के सभी लोग मिलकर यह तय करते हैं कि आज किनके खेत में धान की रोपनी या कटाई करनी है। इसके एवज में मजदूरी भुगतान नहीं किया जाता है। सिर्फ उस परिवार की ओर से दोपहर के भोजन और हड़िया का इंतजाम किया जाता है, जिसके खेत में धान की कटाई या रोपनी करनी होती है। इस तरह से झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में ‘लेबर मार्केट’ या ‘मार्केट इकोनॉमी’ का कोई खास महत्व नहीं होता है।

विकास परियोजनाओं से देशभर में 6 करोड़ लोग विस्थापित

पुणे और महाराष्ट्र में वर्षाे तक अध्ययन करने वाले देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री आशीष कोठारी का कहना है कि 60 साल में विकास मॉडल का अध्ययन करने से कई सवाल खड़े होते हैं। आजादी के बाद देश भर में विभिन्न विकास परियोजनाओं से करीब 6 करोड़ लोग विस्थापित हुए। आंकड़ों से साफ हो जाता है कि विस्थापित होने वाले ज्यादातर परिवारों का पुनर्विकास नहीं हो पाया है। वहीं विकास के वर्तमान मॉडल से पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर भी प्रभाव पड़ा है। झारखंड जैसे खनिज बहुल राज्यों की स्थिति तो और खराब रही है। राज्य के कोयला खनन क्षेत्रों से यह खबर भी मिलती है कि प्रतिदिन 20 से 30 रुपये कमाने वाले कोयला निकालने के लिए खतरनाक बंद पड़े माइंस में प्रवेश कर जाते हैं, इनमें से कई लोगों की जान भी चली जाती है। वनाधिकार कानून के तहत भी सिर्फ 2 प्रतिशत लोगों को वन भूमि का पट्टा मिल सका है। ऐसी स्थिति में विकास के वैकल्पिक मॉडल के तलाश की जरूरत है।

विकास मॉडल में आदिवासी दर्शन काफी महत्वपूर्ण

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और विनोबा भावे विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ0 रमेश शरण का कहना है कि आदिवासी दर्शन काफी महत्वपूर्ण है। राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था इसी पर टिकी है। दूसरी तरफ न्यू लिबरल इकोनॉमी में कमाते जाओ, कमाते जाओ, भले ही मृत्यु क्यों न हो जाए, इस थ्योरी पर काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब विकास योजनाओं से विस्थापित होने वाले दो-तिहाई परिवारों का अब तक पुनर्वास नहीं हो पाया। अब भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग घूमंतू जीवन जीने के लिए मजबूर है, तो विकास के किस मॉडल को अपनाया जाए। मौजूदा समय और भविष्य की यह मांग है कि विकास अवरुद्ध न हो और जलवायु और पर्यावरण को भी नुकसान न हो। इसमें रुरल इकोनॉमी का मॉडल काफी कारगर सिद्ध हो सकता है।

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