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हरिवंश के सामने इतने बेबस क्यों नीतीश, मन मारकर लेना पड़ा इतना बड़ा फैसला!

राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश नारायण का राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटाया जाना कोई मुद्दा नहीं है। मुद्दा गर है तो राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बेबसी। ऐसा इसलिए कि नीतीश कुमार और हरिवंश के बीच दूरियां का आकलन करें तो यह कार्रवाई ठीक ‘दिल बहलाने को गालिब यह ख्याल अच्छा है’ जैसा है। वश चलता तो नीतीश कुमार कब का राज्यसभा की सदस्यता रद्द करा दिए होते।

कैसे नीतीश और हरिवंश के बीच बढ़ी खाई

नीतीश कुमार और हरिवंश नारायण के बीच बढ़ती दूरियों के कई कारण हैं।

  • नीतीश कुमार ने जब भाजपा नीत गठबंधन को अलविदा कर महागठबंधन से रिश्ता जोड़ा और प्रदेश में सरकार बनाई, उसी समय हरिवंश नारायण को नैतिकता के आधार पर उप सभापति के पद से इस्तीफा देते। नीतीश कुमार उनसे स्वत: निर्णय की उम्मीद लगाए बैठे थे। पर ऐसा नहीं कर हरिवंश नारायण ने नीतीश कुमार की उम्मीद को पहला झटका दिया।
  • नए सदन भवन के उद्धाटन सत्र का जब जनता दल यू ने बहिष्कार किया तब भी नीतीश कुमार चाहते थे कि हरिवंश नारायण भी सदन के उद्धाटन सत्र का बहिष्कार करें। पर हरिवंश नारायण अपनी उप सभापति की भूमिका के साथ खड़े हुए। और वह न केवल नए सदन भवन के उद्धाटन समारोह में भाग लिया बल्कि संबोधन भी किया।
  • दिल्ली विधेयक पर नीतीश कुमार चाहते थे कि हरिवंश नारायण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के विरोध में और दिल्ली विधेयक के पक्ष में वोट करें। पर हरिवंश नारायण ने नीतीश कुमार को हैरान परेशान किया। दिल्ली विधेयक के दिन सत्र में बैठे रहे और जब वोटिंग की बारी आनेवाली थे वह सभापति की कुर्सी पर विराजमान होकर खुद को जदयू सांसद की स्थिति से दूर होकर उप सभापति की भूमिका में आ गए और पद की नैतिकता के साथ खड़े रहे।

तकनीकी रूप से जदयू में थे हरिवंश

महागठबंधन के साथ बिहार में सरकार बनाने और देश स्तर पर इंडिया गठबंधन बनाने के दौरान उप सभापति हरिवंश नारायण नीतीश कुमार से दूरी तो बनाया ही साथ ही उनके बारे में यह कहा जाने लगा कि वह पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह के फोल्ड में चले गए हैं। उनके इस आचरण के बाद भी वह जदयू के सदस्य बने रहे। ऐसा तब तक रहता है जब तक हरिवंश नारायण को पार्टी की सदस्यता और राज्य सभा की सदस्यता से भी वंचित कर देते। पर ऐसा नीतीश कुमार नहीं कर सकते थे ये भी हरिवंश नारायण समझते थे। और वह इसलिए भी अपने मन से और आराम से अपनी पारी खेल रहे थे।

क्या थी नीतीश कुमार की मजबूरी?

दरअसल, नीतीश कुमार चाह कर भी जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह को पार्टी की सदस्यता रद्द करने को नहीं कह सकते थे। ऐसा इसलिए कि नीतीश कुमार जानते थे कि पार्टी की सदस्यता रद्द कर देने के बाद हरिवंश नारायण और भी निरंकुश हो जाएंगे। इसलिए पार्टी के बंधन से बांध कर रख सकते हैं। सटे पावर को समाप्त कर एक आम सदस्य की तरह रहने दें। मन करे तो वे स्वयं छोड़कर चले जाएं।

राज्य सभा की सदस्यता नहीं समाप्त कर सकते

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यह जानते हैं कि हरिवंश नारायण अपरोक्ष रूप से ही जब तक पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ खड़े वों तो उनकी राज्य सभा की सदस्यता समाप्त नही कर सकते। बहुत करते तो वह राज्यसभा के सभापति यानी उप राष्ट्रपति को उनकी सदस्यता रद्द करने को पत्र लिखते। मगर, अपने विवेक पर सभापति उस पत्र को पेंडिंग में रखकर टालते रहते। अब इनके पास एकमात्र विकल्प यही है कि देश में बने नये गठबंधन I.N.D.I.A की सरकार बने और तब नीतीश कुमार पत्र लिखकर हरिवंश नारायण की सदस्यता रद्द करने की मांग करें। सो, यह कह सकते हैं कि नीतीश कुमार ने अपनी खुन्नस निकालकर अपने दिल को सकूं पहुंचाने की कोशिश की है। परंतु वह अपनी विवशता नहीं छुपा सके।

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