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राहुल गांधी को राहत से विपक्षी एकजुटता पर संकट! क्या बीजेपी के लिए भी खुशखबरी है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

राहुल गांधी को मोदी सरनेम वाले आपराधिक मानहानि केस में मिली दो साल की सजा पर सुप्रीम कोर्ट से लगी रोक के बाद, विपक्षी राजनीति में संभावनाओं के कई द्वार खुल गए हैं। राहुल ने जान-बूझकर, बड़ी चालाकी से बेंगलुरु की विपक्षी एकता बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत अन्य विपक्षी नेताओं को सामने रखा। वह खुद पीछे रहे। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी का कहना है कि अब जब राहुल की सांसदी बहाल हो जाएगी तब उनका विपक्षी एकता अभियान के केंद्र में आने की संभावना पैदा हो गई है। उन्होंने अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में कहा कि राहुल गांधी को जब 2 साल जेल की सजा सुनाई गई तो बिना देर उनकी संसद सदस्यता समाप्त कर दी गई। अब सजा पर रोक लगने के बाद उनकी सदस्यता अगर उसी तेजी से बहाल नहीं की गई तो जनता के बीच राहुल गांधी के प्रति सहानुभूति बढ़ सकती है। बीजेपी निश्चित रूप से इस पर मंथन कर रही होगी।

नीरजा चौधरी लिखती हैं, ‘विरोधियों के खिलाफ ईडी और सीबीआई के इस्तेमाल से विपक्षी दलों को एकजुट होने की जरूरत महसूस हो रही थी कि राहुल गांधी को अयोग्य ठहरा दिए जाने के बाद उनमें हड़कंप मच गया। उन्होंने इसे बड़े खतरे की घंटी की तरह लिया। उन्हें लगा कि आज राहुल गांधी नप गए तो कल किसी और की भी बारी आ सकती है।’ वो कहती हैं कि अपने नेताओं के खिलाफ ईडी-सीबीआई के इस्तेमाल से विपक्षी दल जनता से सहानुभूति बटोरने में नाकामयाब रहे थे, लेकिन जब राहुल गांधी पर कार्रवाई हुई तो बहुत से लोगों को लगा कि राहुल गांधी को सरकार की कड़ी आलोचना करने की सजा मिली है।

क्या अब बैक सीट से फ्रंटफुट पर आएंगे राहुल?

लेकिन सवाल है कि क्या राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी की भूमिका में आने को तैयार हैं? क्या वो खुद को कांग्रेस पार्टी में जान फूंकने और चुनाव मैदान में विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A के सहयोगी दलों का साथ देने तक सीमित रखेंगे? क्या वो 2024 लोकसभा चुनाव में खुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार प्रॉजेक्ट करने से बचेंगे? वर्ष 2004 में सोनिया गांधी ने भाजपा सरकार को सत्ता से बेदखल करने के बाद राहुल गांधी के विरोध के कारण प्रधानमंत्री का पद लेने से इनकार कर दिया था। इस त्याग ने सोनिया गांधी की गठबंधन दलों के बीच पैठ बढ़ा दी थी।

राहुल गांधी आम जनता के बीच जाने के कार्यक्रमों के साथ निखर रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स, आजादपुर मंडी के आढ़तियों, करोल बाग के बाइक मैकेनिकों और सोनीपत के किसानों तक, राहुल गांधी ने आम जनता से संवाद की कोशिशें तेज की हैं। उनके लिए यही ठीक है क्योंकि वो पार्टी संगठन की रणनीतियों में फिट नहीं बैठते हैं। राहुल के बहुत से सहयोगियों ने उनपर आरोप लगाया है कि वो आसानी से मिलते-जुलते नहीं हैं। इसे राहुल गांधी की अकड़ के रूप में देखा गया।

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