अदालत ने कहा कि इस हालत में सफर करना “शर्मनाक” है। एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की गई थी, जिसमें मुंबई उपनगरीय रेलवे नेटवर्क पर यात्री मृत्यु दर की उच्च संख्या को उजागर किया गया था।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति अमित बोरकर की पीठ ने रेलवे की खराब सुरक्षा उपायों पर सवाल उठाया। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया, “कॉलेज आना या काम पर जाना युद्ध में जाने जैसा है, क्योंकि रेलवे में होने वाली मौतें युद्ध में मारे जाने वाले सैनिकों की संख्या से भी ज्यादा हैं।”
अदालत ने इस बात पर भी असहमति जताई कि रेलवे ट्रैक पार करने, ट्रेनों से गिरने या प्लेटफॉर्म-ट्रेन के बीच की खाई में फिसलने के कारण होने वाली मौतों को “अप्रिय घटना” के रूप में वर्गीकृत किया जाए। पीठ ने कहा कि यह रेलवे की जवाबदेही तय करने से बचने का एक तरीका है।
अदालत ने रेलवे के महाप्रबंधकों को इस मामले में हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। इन हलफनामों में मौजूदा उपायों का विवरण और यात्री सुरक्षा में सुधार के लिए नए सुझाव शामिल होने चाहिए।


