रांची में झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने देवघर से जुड़े एक महत्वपूर्ण भूमि विवाद मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। यह मामला बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट और परित्राण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल से संबंधित है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने राज्य सरकार और मेडिकल कॉलेज की ओर से दायर अपीलों को खारिज कर दिया। इस फैसले से बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने म्यूटेशन से जुड़े मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की है। खंडपीठ ने कहा कि राजस्व अभिलेख केवल राजस्व वसूली के उद्देश्य से बनाए जाते हैं। राजस्व अधिकारी स्वामित्व का अंतिम निर्णय नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि म्यूटेशन का अर्थ स्वामित्व तय करना नहीं होता। यह फैसला भूमि विवाद से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामले के अनुसार बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट ने बैंक की सार्वजनिक नीलामी में संबंधित भूमि खरीदी थी। कलपीठ ने सर्किल ऑफिसर के आदेश को रद्द कर ट्रस्ट के पक्ष में निर्णय दिया था। बाद में राज्य सरकार और मेडिकल कॉलेज ने इस आदेश को चुनौती दी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि संबंधित भूमि को पहले मेडिकल कॉलेज ने स्वयं बैंक के पास गिरवी रखा था। लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। ऐसे में बिक्री प्रमाणपत्र प्रभावी और वैध माना जाएगा।
खंडपीठ ने कहा कि म्यूटेशन आवेदन खारिज करते समय जिन कारणों का उल्लेख नहीं किया गया था, उन्हें बाद में अदालत में जोड़कर आदेश का बचाव नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस संबंध में स्थापित कानूनी सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। न्यायालय ने राज्य सरकार के रुख पर आश्चर्य व्यक्त किया। अदालत ने कहा कि जिस भूमि पर पहले म्यूटेशन स्वीकार किया गया था, उसी भूमि पर अब नीलामी खरीदार के म्यूटेशन का विरोध उचित नहीं है। खंडपीठ ने यह भी कहा कि किसी आवेदन को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि सीधे आवश्यकता प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश देना सामान्य प्रक्रिया नहीं है। न्यायालय ने उपायुक्त देवघर को चार सप्ताह के भीतर भूमि सत्यापन पूरा करने का निर्देश दिया है। इसके बाद सक्षम प्राधिकारी को छह सप्ताह के भीतर आवेदन पर निर्णय लेना होगा। अदालत ने कहा कि निर्णय कानून और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर लिया जाना चाहिए।



