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सारंडा वन्यजीव अभयारण्य पर आदेश और सरकार की दुविधा.

संरक्षण और खनन हितों के बीच फंसा सुप्रीम कोर्ट निर्देश.

सारंडा वन क्षेत्र लंबे समय से पर्यावरणीय बहस का केंद्र रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अभयारण्य घोषित करने का निर्देश दिया था। आदेश 13 नवंबर 2025 को पारित हुआ था। राज्य सरकार को तीन महीने का समय दिया गया था। उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण को मजबूत करना था। लेकिन सरकार ने आदेश को लागू नहीं किया। इसके बजाय पुनर्विचार याचिका दायर की गई। यह बात विधानसभा में सामने आई। सरकार ने इसे जरूरी कदम बताया। पर्यावरणीय फैसलों पर बहस तेज हो गई है।

वन एवं पर्यावरण विभाग ने आदेश की पुष्टि की। कुल 31468.25 हेक्टेयर क्षेत्र अधिसूचना में शामिल था। छह कम्पार्टमेंट को खनन कारणों से बाहर रखा गया था। यह क्षेत्र 2016 की खनन योजना के अंतर्गत आता है। प्रभावी रूप से बड़ा हिस्सा अभयारण्य बनना था। लेकिन समय सीमा खत्म हो गई। 12 फरवरी 2026 तक अधिसूचना जारी नहीं हुई। सरकार ने इसे कानूनी प्रक्रिया से जोड़ा। पुनर्विचार याचिका की स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। इससे अनिश्चितता बनी हुई है।

सारंडा क्षेत्र पहले गेम सैंक्चुअरी रह चुका है। यह क्षेत्र जैव विविधता के लिए अहम माना जाता है। संरक्षण समर्थक आदेश लागू करने की मांग कर रहे हैं। खनन से जुड़े हित भी सामने हैं। सरकार संतुलन बनाने की कोशिश में है। अदालत का अगला रुख निर्णायक होगा। पर्यावरणीय नीति पर असर पड़ेगा। राज्य की छवि भी इससे जुड़ी है। देरी से सवाल उठ रहे हैं। आने वाले समय में फैसला अहम होगा।

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