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चिराग के सियासी गेम प्लान ने दिया नीतीश और कांग्रेस को झटका, चाचा पशुपति पारस देखते रह गए, जानिए पूरी बात

बिहार में इंडी अलायंस के नेता एनडीए के घटक दलों में शामिल होते रहे हैं। पहले जेडीयू से इसकी शुरुआत हुई। उसके दर्जनभर से ज्यादा कद्दावर नेता टूटे। ज्यादातर ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। अब लोजपा (आर) ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसकी ताजा झांकी मुजफ्फरपुर के मोतीपुर में रविवार को देखने को मिली। कांग्रेस के महिला प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष रह चुकीं विनीता विजय ने अपने समर्थकों के साथ लोजपा (राम विलास) की सदस्यता ग्रहण कर ली है। बिहार में 11 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका है। विनीता बिहार के भूतपूर्व मंत्री रघुनाथ झा की बहू हैं। लंबे समय तक कांग्रेस के साथ वे जुड़ी रहीं।

वैशाली से कैंडिडेट बनाने की चर्चा

सियासी हलके में चर्चा है कि विनीता विजय को कांग्रेस से निकाल कर अपने दल में शामिल कराने वाले चिराग पासवान उन्हें वैशाली से उम्मीदवार बना सकते हैं। वैशाली से वीणा देवी अभी लोजपा की सांसद हैं। लोजपा के दो फाड़ होने पर वीणा देवी पशुपति पारस के साथ चली गई थीं। हालांकि अब वे चिराग पासवान के काफी करीब हैं। हाल के दिनों में वीणा देवी ने चिराग पासवान की जिस तरह तारीफ करनी शुरू की है, उससे किसी को यह विश्वास नहीं हो रहा है कि उनका टिकट कटना चाहिए। वीणा ने अब स्पष्ट तौर पर कहना शुरू किया है कि उनके नेता चिराग पासवान हैं। वे उन्हें अपना आदर्श मानती हैं। चिराग के विजन- बिहार फर्स्ट ‘बिहारी फर्स्ट’ पर लोग काम कर रहे हैं। चिराग की तारीफ में तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि उन्हें (चिराग को) बिहार के सीएम के रूप में जनता देख रही है।

लोजपा में वीणा देवी को खतरा

विनीता विजय के पार्टी में आने के बाद वीणा देवी के वैशाली से चिराग की पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने में संदेह की स्थिति उत्पन्न हो गई है। ऐसी स्थिति में अगर कोई पार्टी उन्हें मौका दे तो उनके लिए पाला बदलना कोई अचरज की बात नहीं होगी। विनीता विजय कभी कांग्रेस की बड़ी नेता रही हैं। वे भूतपूर्व मंत्री रघुनाथ पांडेय की बहू तो हैं ही, वर्ष 2009 में लोकसभा का चुनाव भी कांग्रेस के टिकट पर लड़ चुकी हैं। साल 2010 में कांग्रेस ने उन्हें बिहार प्रदेश महिला कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनाया था। कांग्रेस ने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने पार्टी की ही जमीन हड़प ली थी। इसी शिकायत के मद्देनजर पार्टी ने उन्हें 2015 में छह साल के लिए निकाल दिया था।

चिराग इलेक्शन में रहे हैं बड़ा फैक्टर

चिराग पासवान की उपलब्धि सिर्फ यही नहीं है। उनकी एक और बड़ी उपलब्धि उल्लेखनीय है। साल 2020 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने जेडीयू के खिलाफ अपने कैंडिडेट उतार कर नीतीश की खाट खड़ी कर दी थी। जेडीयू दावा करता है कि चिराग की वजह से ही उसके कम से कम ढाई दर्जन उम्मीदवार हार गए। जेडीयू 45 सीटों पर सिमट गया। नीतीश कुमार की दुर्गति चिराग ने कर दी। कहा तो यह भी जाता है कि भाजपा के इशारे पर ही चिराग ने यह काम किया था। हालांकि उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। नीतीश तब बीजेपी के साथ थे। नीतीश के कहने पर बीजेपी ने चिराग को एनडीए से बाहर कर दिया। नीतीश का मन इससे भी नहीं भरा तो उन्होंने लोजपा का विभाजन भी करा दिया। नीतीश की वजह से ही लोजपा दो भागों में बंट गई, ऐसा चिराग पासवान के खेमे के लोग कहते हैं। ऐसा नहीं होता तो पशुपति पारस की जगह चिराग केंद्रीय मंत्री बने होते।

विभाजन और लोजपा

विभाजन के बाद लोजपा के छह सांसदों में पांच राम विलास पासवान के भाई पशुपति कुमार पारस के साथ चले गए। अपने खेमे में अकेले चिराग ही सांसद रह गए थे। एनडीए ने उन्हें बाहर भी कर दिया था। यह बात जरूर है कि चिराग ने हार नहीं मानी और बिहार में अपने दम पर उन्होंने पार्टी का अलख जगाए रखा। बिहार में सियासी सक्रियता की अगर विपक्ष के किसी नेता की चर्चा होगी तो उसमें चिराग अव्वल निकलेंगे। उन्होंने अपना स्टैंड भी नहीं बदला। हमेशा नीतीश कुमार की नीतियों की वे आलोचना करते रहे। बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट के स्लोगन के साथ पिछले विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक वे अलख जगाते रहे हैं।

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