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जिंदगी बचाने की जिद में ‘मालती’ ने खुद को समाज के लिए किया समर्पित, कहानी जान कहेंगे-ऐसे ही डॉक्टर होते हैं धरती के भगवान

झारखंड में बोकारो जिले की रहने वाली मालती नायक ने वनौषधि के माध्यम से इलाज कर कई लोगों को नया जीवनदान दिया। मालती अब तक हजारो लोगों को आयुर्वेद और वन औषधीय इलाज के जरिये लाभ पहुंचा चुकी हैं। इनमें बहुतों को तो नया जीवन देने से सफलता पाईं। स्थानीय ग्रामीण बताते है कि साल 2006 में बरतु घासी की बेटी काजल कुमारी अचानक लकवाग्रस्त हो गई थी। पूरा परिवार चिंतित और परेशान था। मालती ने वनौषधि की मदद से सफल इलाज़ करते हुए 3 घंटे में उसे पूर्णतः स्वस्थ कर दिया। इसी तरह से वर्ष 2008 में हलमाद बाजार के खेतु रविदास कोमा में चले गए थे। उसकी जिंदगी पूरी तरह से खतरे में पड़ चुकी थी, मालती ने वनौषधि से इलाज करते हुए उसे कोमा से बाहर निकाला और नया जीवन दिया। मालती नायक आज भी ग्रामीणों को सेवा दे रही हैं। वे गरीबों का मुफ्त इलाज करती हैं।

साक्षरता अभियान को सफल बनाने मालती घर से बाहर निकली

दो दशक पहले बोकारो जिला के कसमार प्रखंड और इसके आसपास के क्षेत्रों में गांवों की महिलाओं की सामाजिक गतिविधियां नगण्य थी। महिलाएं सामाजिक कार्यों के लिए घर की देहरी लांघकर निकलने से कतराती थी, या फिर हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। ऐसी बात नहीं कि तब महिलाओं में सामाजिक जिम्मेदारियों का अहसास नहीं था। लेकिन, घर-समाज की पाबंदी उन्हें घरों से निकलने से बांधे रखती थीं। कुछ लोग चाह-कर भी समाज के तानों के डर से अपने घरों की महिलाओं को सामाजिक कार्यों में भागीदारी के लिए आगे बढ़ने की इजाजत नहीं दे पाते थे। उन दिनों इस क्षेत्र में कुछ गिनी-चुनी महिलाएं ही सामाजिक कार्यों में घरों से निकलने की हिम्मत जुटा पाती थीं। मालती नायक भी उन्हीं चंद महिलाओं में एक है। दांतू गांव निवासी विवेकानंद नायक की पत्नी मालती (उम्र 48 वर्ष) ने वर्ष 2000 में सामाजिक क्षेत्र में उन दिनों कदम रखा, जब बोकारो के तत्कालीन उपायुक्त विमल कृति सिंह के नेतृत्व में साक्षरता अभियान ने बहुत जोर पकड़ा था। इस अभियान को सफल बनाने के लिए इसमें महिलाओं को जोड़ना सबसे जरूरी था, क्योंकि कुल आबादी में निरक्षरों की संख्या पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की अधिक थी। साक्षरता अभियान में महिला नेतृत्व के बिना इस अभियान को सफल बनाना संभव नहीं था। इसी परिस्थिति में मालती नायक अपने पति की प्रेरणा से घर की देहरी लांघ कर बाहर निकली और साक्षरता अभियान से जुड़कर इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। मालती ने इस अभियान को सफल बनाने के लिए खुद को पूरी तरह से समर्पित कर दिया और प्रखंड की हजारों महिलाओं को इस अभियान से जोड़कर साक्षर बनाने की प्रक्रिया से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।

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