हमसे का भूल हुई जो ये सजा हमका मिली…PM मोदी क्यों कर रहे CM शिवराज को इग्नोर?
25 सितंबर को भोपाल यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सार्वजनिक उपेक्षा के बाद यह सवाल सबकी जुबान पर है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों प्रधानमंत्री ने लाखों कार्यकर्ताओं के सामने न तो शिवराज सिंह का नाम लिया और न ही उनकी किसी जनहित वाली योजना का जिक्र किया? सब यह मान रहे हैं कि आजाद भारत में इस तरह का व्यवहार विरोधी दलों के नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से एक दूसरे के साथ अभी तक नहीं किया। फिर नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह तो एक ही दल के हैं। साथ ही समकालीन भी। तकनीकी दृष्टि से देखें तो शिवराज सिंह चौहान चुनावी राजनीति में मोदी से बहुत वरिष्ठ हैं। वह 1990 में विधायक बन गए थे। जबकि मोदी करीब 11 साल बाद 2001 में विधानसभा पहुंचे थे।
आडवाणी ने शिवराज को बताया था पीएम फेस
दोनों में संबंध भी सौहार्दपूर्ण ही रहे हैं। हालांकि 2014 में लालकृष्ण आडवाणी ने मोदी के साथ शिवराज सिंह का नाम भी प्रधान मंत्री पद के योग्य बीजेपी नेताओं की सूची में गिनाया था। लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद शिवराज सिंह ने धीरे-धीरे मोदी के सामने आत्मसमर्पण सा कर दिया था। पिछले कुछ साल से तो वह मोदी को भारत के लिए भगवान की देन ही बता रहे हैं। कभी भी उनका रास्ता काटने की कोशिश तो दूर उधर देखने की कोशिश तक नहीं की।
तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ जो नरेंद्र मोदी ने पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं के सामने भोपाल में शिवराज का नाम लेना भी जरूरी नहीं समझा? हालांकि वह अमित शाह के जरिए यह बात पहले ही साफ करवा चुके थे कि शिवराज अगले मुख्यमंत्री नहीं होंगे। लेकिन प्रदेश की पहली बड़ी चुनावी सभा में सामान्य शिष्टाचार का भी निर्वहन न किया जाना एक बड़ा सवाल बन गया है। जिसका उत्तर अब प्रदेश का हर बीजेपी कार्यकर्ता जानना चाहता है।
2014 के बाद से मोदी के सामने सरेंडर हैं शिवराज!
हालांकि मोदी के मन की बात भगवान के अलावा शायद ही कोई जानता हो। लेकिन बीजेपी के ‘सूत्र’ ये मान रहे हैं कि मोदी की नाराजगी की वजह शिवराज के करीब 17 साल के कार्यकाल के दौरान उभरे विवाद या जनता की नाराजगी नहीं है। दरअसल, मोदी शिवराज की ओर से उनके समानांतर रेखा खींचे जाने की कोशिश से नाखुश हैं। पिछले कुछ सालों में शिवराज सिंह ने व्यक्तिगत प्रचार और इमेज बिल्डिंग के लिए मोदी की तर्ज पर अपना निजी प्रचार तंत्र खड़ा किया। उन्होंने निजी एजेंसियों की सेवा ली। चुपचाप मोदी का अनुसरण किया। उन्होंने अपनी कुछ योजनाओं का प्रचार तो पूरी दुनिया में कराया।
आयोध्या-काशी के जवाब में उज्जैन और ओमकारेश्वर
मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर बनवाने का श्रेय हासिल किया है। काशी में विश्वनाथ कारीडोर बनवा कर उन्होंने अपना नाम इतिहास में दर्ज कराया है। इस बीच शिवराज ने भी अपने राज्य में मठ मंदिरों के पुनर्निमाण की शुरुआत की। सबसे पहले उन्होंने काशी की तरह उज्जैन में महाकाल के महालोक का निर्माण शुरू कराया। चुनावी लाभ लेने के लिए इसके पहले चरण का उद्घाटन भी नरेंद्र मोदी से ही कराया। इस महालोक की चर्चा दुनिया भर में हुई। हालांकि बाद में घटिया निर्माण की वजह से बदनामी भी पूरी दुनियां में हुई। इससे मोदी नाराज हुए।
शिवराज महाकाल के महालोक तक ही नहीं रुके। उन्होंने राज्य में कई जगहों पर देवी देवताओं के लोक बनवाने का काम शुरू किया। रामराजा लोक, देवी लोक, परशुराम लोक, रैदास मंदिर आदि प्रमुख धार्मिक परियोजनाएं प्रदेश में चल रही हैं। देश में चलाए जा रहे भगवा अभियान में इन सभी की व्यापक चर्चा भी हो रही है।
इन सब में सबसे ज्यादा अहम है ओंकारेश्वर में नर्मदा के तट पर आदि शंकराचार्य की 108 फिट ऊंची प्रतिमा की स्थापना। करीब ढाई हजार करोड़ रुपये की लागत से ओंकारेश्वर पर्वत पर बने एकात्म परिसर में स्थापित यह प्रतिमा दुनिया में शंकराचार्य की सबसे ऊंची प्रतिमा है। अभी एक सप्ताह पहले 19 सितंबर को ही शिवराज सिंह ने इस प्रतिमा का भव्य सरकारी समारोह में अनावरण किया था।
हालांकि पहले खुद प्रधानमंत्री शंकराचार्य की प्रतिमा का अनावरण करने वाले थे। लेकिन वे नहीं आए। कारण क्या रहा वही जाने। कहा यह जा रहा है कि मोदी नर्मदा के तट पर शंकराचार्य की विशाल प्रतिमा लगाए जाने से खुश नहीं थे। यह अलग बात है कि शिवराज पार्टी के एजेंडे पर ही काम कर रहे थे। लेकिन इस प्रतिमा की तुलना मोदी की ओर से गुजरात में लगवाई गई सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा से किया जाना उन्हें अच्छा नहीं लगा। नर्मदा के तट पर पटेल के प्रतिमा स्थल को उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कराया है। जबकि ओंकारेश्वर में ज्योतिर्लिंग होने की वजह से यहां पूरे साल तीर्थ यात्री आते रहते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि शंकराचार्य की प्रतिमा पटेल की प्रतिमा को प्रभावित करेगी।




