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जब माधवराव सिंधिया के जन्म पर मिठाई खाने सिंधिया पैलेस पहुंच गए थे अटल बिहारी वाजपेयी

एमपी में चुनाव का समय है। माहौल गरम है। प्रदेश की मुख्य पार्टियों के बीच वार-पलटवार का दौर चल रहा है। हालांकि एक समय था, जब विचारधारा अलग होने के बावजूद भी राजनेता व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं करते थे। भाषा में शालीनता होती थी, व्यवहार में विनम्रता होती थी। ऐसा ही एक किस्सा है कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का…इस किस्से का जिक्र वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने अपनी किताब ‘द हाउस ऑफ सिंधिया: अ सागा ऑफ पावर, पॉलिटिक्स एंड इंट्रीग’ में किया है।

माधवराव का जन्म 10 मार्च 1945 को बॉम्बे के बीकानेर हाउस में हुआ था, जो बॉम्बे में नेपियन सी रोड पर बनी हुई बहुत ही महंगी प्रॉपर्टी थी। यह बीकानेर महाराजा के आधिपत्य में थी। शिशु का नामकरण उनके दादा माधव राव (अक्टूबर 1876- जून 1925) के नाम पर किया गया था। यह नाम शिशु की बुआ आशा देवी फालके ने रखा था, लेकिन नाम रखते समय ये उसकी वर्तनी माधो राव सिंधिया कर गईं। सिंधिया परिवार में यह परम्परा थी कि नवजात राजकुमार का नाम रखने का गौरव महाराजा की बहन को दिया जाता था।

कैदियों को कर दिया था रिहा
जीवाजीराव और विजया राजे की तीसरी संतान थे माधवराव सिंधिया। पद्मा राजे और उषा राजे बड़ी बहनें तो वसुंधरा और यशोधरा छोटी बहनें थीं। उनके जन्म के तीन महीने बाद तक खुशिया मनाई जाती रही। उनके जन्म पर सिंधिया साम्राज्य में काम कर रहे हर कर्मचारी को प्रमोशन दिया गया। छोटे अपराधों के लिए जेलों में बंद कैदियों को रिहा कर दिया गया। इस अवसर पर 21 तोपें भी चलाई गईं, जो इस बात का संकेत था कि सिंधिया घराने में गद्दी के वारिस का आगमन हो गया है।

कवि के तौर पर मिठाई खाने पहुंचे थे वाजपेयी
पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न पंडित अटल बिहारी वाजपेयी भी इस मौके पर पीछे नहीं रहे। उस समय वे कविताएं किया करते थे, लेकिन तब उन्हें ग्वालियर में कोई जानता नहीं था। रशीद किदवई लिखते हैं कि पूरे सिंधिया साम्राज्य में जब मिठाइयां बांटी गई तो उन्होंने भी इसका आनंद उठाया। पंडित अटल बिहारी वाजपेयी मिठाईयों के बहुत शौकीन माने जाते थे। उनके मिठाईयों से जुड़े किस्से भी खूब चर्चा में रहते हैं।

महंगी पड़ी थी मिठाई
हालांकि ये मिठाई पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी को महंगी पड़ गई, क्योंकि सन् 84 में उन्हें ग्वालियर लोकसभा सीट से माधवराव सिंधिया ने हरा दिया था। उस समय उनके राजमाता सिंधिया के भी ग्वालियर से चुनाव लड़ने की अटकलें थीं, लेकिन ये पता चलने पर वाजपेयी राजमाता से मिलने ग्वालियर आए और उन्हें बताया कि वह इसी सीट से चुनाव लड़ेंगे। हालांकि वह चुनाव हार गए थे। पत्रकारों ने जब उनसे हार का कारण पूछा तो उन्होंने अपने ही अंदाज में इसका जवाब दिया। उन्होंने कहा यहां से ‘चुनाव लड़कर मैंने मां बेटे की लड़ाई को महल तक सीमित कर दिया, उसे सड़क तक नहीं आने दिया।’

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