राहुल गांधी के शिफ्ट होने की खबर से फिर चर्चा में आया ईस्ट निजामुद्दीन, दिल्ली का यह इलाका है बेहद खास
कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के ईस्ट निजामुद्दीन में शिफ्ट होने की खबरें पिछले दिनों चली थीं। कहा जा रहा थाकि वे उसी घर में रहेंगे जिसमें दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित रहा करती थीं। अपने आप में लाजवाब एरिया है ईस्ट निजामुद्दीन। इधर ही पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी और एम.ए.गिल भी रहते हैं। स्वामी का ‘ए’ब्लाक में अपना आशियाना है। अंग्रेजी के लेखक विक्रम सेठ ने भी यहां अपना आशियाना बना लिया है। क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन भी इधर रहे हैं। ईस्ट निजामुद्दीन 1952 में बनी थी। यहां पर लगभग 250 प्लॉट हैं और पचास के आसपास पार्क होंगे। कहने वाले तो कहते हैं कि यहां से ज्यादा गुलों की महक बिखेरने वाले पार्क राजधानी की किसी कॉलोनी में नहीं है। नई दिल्ली और साउथ दिल्ली के दिल में बसे ईस्ट निजामुद्दीन में एक बार कोई रह लिया तो फिर यहां से उसका जाना मुश्किल हो जाता है। जाने-माने लेखक और पत्रकार मार्क टली भी अपनी मित्र जिलियन राइट के साथ यहां रहे। फिलहाल वे वेस्ट निजामुद्दीन में रहते हैं।ईस्ट निजामुद्दीन में अब्दुल रहीम खानखाना
ईस्ट निजामुद्दीन के अंदर ही मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक अब्दुल रहीम खानखाना का मकबरा है। वे सुप्रसिद्ध कवि भी थे। रहीम के मकबरा का निर्माण उनकी पत्नी ने करवाया था। अब इसे नए सिरे से बनाया गया है। इसमें आगा खान ट्रस्ट की खास भूमिका रही। एक दौर में वरिष्ठ पत्रकार एस.पी. सिंह, विनोद मेहता और प्रफुल्ल बिदवई भी यहां रहते थे। ईस्ट निजामुद्दीन में ही ताजदार बाबर का भी घर है। वो चार बार दिल्ली विधानसभा की मेंबर रहीं। अब उनके घर में उनके पुत्र और दिल्ली के पूर्व मेयर सूरी रहते हैं। यहां पर लंबे समय तक प्रो. ओसाफ अहमद भी रहे। वे जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी के फाउंडर हकीम अब्दुल हामिद के करीबी थे। उनकी सदारत में ही जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी बनी थी। ईस्ट निजामुद्दीन से सटा हुआ है निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन। राजधानी में रहने वाले विभिन्न देशों के डिप्लोमेट भी यहां पर रेंट पर रहना पसंद करते हैं। उन्हें यहां का माहौल पसंद आता है। उन्हें आप यहां के पार्कों में सुबह-शाम घूमते हुए देख सकते हैं।
ईस्ट निजामुद्दीन का क्वेटा डीएवी स्कूल
आप जब निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन की तरफ जाते हैं, तो आपको क्वेटा डीएवी स्कूल मिलता है। दरअसल ईस्ट और वेस्ट निजामुद्दीन, भोगल, जंगपुरा वगैरह में 1950 के दशक में बीसियों परिवार क्वेटा और बलूचिस्तान के दूसरे शहरों से आकर बसे। सब नए सिरे से अपनी जिंदगी को शुरू करने की हरचंद कोशिश कर रहे थे। ये नए शहर में जमने लगे, तो इन्होंने इधर अपना स्कूल स्थापित किया 1956 में। नाम रखा क्वेटा डीएवी स्कूल। इस बीच, ईस्ट निजामुद्दीन के अड़ोसी-पड़ोसी एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं। इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि यहां पर कोई अपने पड़ोसी को भी नहीं जानता। यहां पर अधिकतर परिवार बीते दशकों से रह रहे हैं। एक दौर था जब यहां पर लेखक एस.एच. अब्दुल्ला साहब के घर में यारों की लंबी महफिलें चला करती थीं। वे पंजाबी मुस्लिम समाज से ताल्लुक रखते थे। अब्दुल्ला साहब की भांजी थीं लेखिका सादिया देहलवी। सादिया देहलवी भी जीवन के अंतिम समय में इधर ही रहीं।




