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रेप पीड़ित बच्ची मदद की गुहार लगाती रही और लोग दुत्कारते रहे, कैसे इंसान हैं हम?

एक बच्ची मदद की गुहार लगाती रही। एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक दस्तक देती रही। कमर के नीचे बदन पर कपड़ा नहीं है। खून से लथपथ, जख्मी हालत, अधनंगा बदन…लेकिन कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया। 12 साल की बच्ची के साथ दरिंदगी हुई थी। उसके साथ रेप की आशंका है। वह ढाई घंटे तक गलियों में भटकती रही लेकिन उसकी गुहार, उसकी पुकार किसी ने नहीं सुनी। इंसानियत जैसे मर गई हो। एक रेप पीड़ित बच्ची के दर-बदर भटकने की झकझोर देने वाली घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई। एक फुटेज में ये दिख रहा है कि एक शख्स अपने घर के बाहर दरवाजे पर खड़ा है। लड़की मदद की भीख मांगती है लेकिन वह बेशर्मी से दुत्कारते हुए आगे बढ़ने को कहता है। ये घटना है धर्मनगरी उज्जैन से 15 किलोमीटर दूर बडनगर रोड की। एक और घटना देखिए। संयोग से ये भी एक धर्मनगरी की है। मध्य प्रदेश की नहीं, बल्कि यूपी के वाराणसी की। सड़क पर पानी में एक बच्चा गिरा हुआ है। तड़प रहा है क्योंकि पानी में बिजली का करंट उतरा हुआ है। सड़क से होकर गाड़ियां गुजरती हैं, लोग गुजरते हैं लेकिन बच्चे की मदद की कोई कोशिश तक नहीं करता। भला हो उन दो बुजुर्गों का जिन्होंने बच्चे की जान बचाने की कोशिश की और कामयाब भी हुए। आखिर हम कैसे इंसान हैं जो रेप पीड़ित बच्ची की मदद करने के बजाय उसे दुत्कारते हैं? आखिर कैसे इंसान हैं हम जो एक बच्चे को तड़पते हुए देखते हैं लेकिन दिल नहीं पसीजता, उसकी मदद के लिए आगे नहीं बढ़ते? आखिर हम कैसे इंसान हैं जो दुर्घटना में जख्मी या किसी मनबढ़ अपराधी की बीच सड़क पर करतूतों पर तमाशबीन बने रहते हैं? मदद के लिए आगे नहीं आते लेकिन किसी के दर्द का, किसी की चींख का और कभी-कभार तो किसी की मौत के पलों को मोबाइल फोन के कैमरों में कैद करने तक की बेशर्मी जरूर करते हैं।

Ujjain Minor Girl Rape case

दुनिया लगातार तरक्की कर रही है। विज्ञान लगातार चमत्कार कर रहा है। एक से एक तकनीकें आ रही हैं। विकास हो रहा है। लेकिन इन सबके बीच कहीं न कहीं इंसानों की संवेदनाएं मरती जा रही हैं। संवेदना के स्तर पर हम पत्थर होते जा रहे हैं। स्वार्थी होते जा रहे। मुझे क्या, मेरा क्या लेना-देना, यह भाव लोगों के जेहन में गहराई में उतरता जा रहा है। समाज के तौर पर हम कहीं न कहीं नाकाम होते जा रहे हैं। शहरीकरण से पहले ही सामाजिक ताना-बाना बिखर चुका है। लोग खुद में इतने मशगूल और खुदगर्ज हो गए हैं कि उन्हें आस-पास में क्या हो रहा उससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता। लेकिन संवेदना सिर्फ शहरों में नहीं मर रही। गांवों में भी मर रही। कोई संकट में है तो क्या हुआ? कोई हादसे के बाद तड़प रहा है तो क्या हुआ? वे मदद की गुहार लगाते रहेंगे लेकिन हम तमाशबीन बने रहेंगे। अगर समय रहते पीड़ित को मदद मिल जाए तो उसकी जान बच सकती है। अगर तमाशबीन भीड़ में से दो-तीन भी आगे आ जाएं तो बीच सड़क पर किसी को चाकू से गोद रहा बदमाश उल्टे पांव भाग जाए। लेकिन हमें तो ऐसी घटनाओं में वायरल का मसाला दिखता है, वीडियो दिखता है। हम ऐसी घटनाओं पर मोबाइल कैमरे से वीडियो बनाते रहते हैं। तमाशबीनों की भीड़ में अगर किसी का दिल पसीज भी रहा है तो वह चाहता है कि मदद कोई और करे।

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