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‘राजद्रोह पर नया कानून बन भी जाए तो भी कसौटी के दायरे में’, समझिए क्या है ये कानून और क्यों छिड़ी है इस पर बहस

राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान एक तरफ जहां केंद्र सरकार ने कहा कि इस मामले की सुनवाई टाली जानी चाहिए क्योंकि केंद्र IPC के बदले नया कानून लेकर आ रही है। दूसरी तरफ याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि राजद्रोह कानून को निरस्त किया जाना चाहिए। मामले को सीधे सात जजों की बेंच को रेफर किया जाना चाहिए। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि औपनिवेशिक काल में जब यह कानून बनाया गया था तब यह असंज्ञेय अपराध था लेकिन 1973 में इसे संज्ञेय बनाया गया था। बता दें कि संज्ञेय अपराध गंभीर कैटिगरी के अपराधों को कहा जाता है। इन मामलों में पुलिस बिना किसी आदेश के जांच कर सकती है। वहीं, असंज्ञेय अपराध कम गंभीर अपराध होते हैं। इनमें पुलिस मैजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जांच नहीं कर सकती।

केदारनाथ केस का भी होगा परीक्षण
चीफ जस्टिस डी. वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि 1962 में केदारनाथ केस में सुप्रीम कोर्ट के सामने जो मुद्दा था उसमें समानता के अधिकार का मामला नहीं था। हम केदारनाथ केस में दिए गए जजमेंट का भी परीक्षण करना चाहते हैं। तब समानता के अधिकार के मद्देनजर इसे चुनौती नहीं दी गई थी, बल्कि तब विचार की अभिव्यक्ति के आधार पर इसे चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जो व्याख्या की थी तब वह संकीर्ण व्याख्या थी, लेकिन उसके बाद जो विकास हुए हैं और आर्टिकल-14 के तहत इसकी व्याख्या नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इसके मद्देनजर मामले को संवैधानिक बेंच को रेफर किया है।

धारा-124A निरस्त करने की मांग
इस मामले में धारा-124A को निरस्त करने की गुहार है। सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने दलील दी कि मुख्य मुद्दा यह है कि राज्य और सरकार को एक में मिला दिया गया है। अगर कोई सरकार के खिलाफ असंतोष रखता है तो वह असंतोष देश के खिलाफ नहीं माना जा सकता है। जब धारा 124A बनाई थी तब देश और सरकार में फर्क नहीं था। यह प्रावधान औपनिवेशिक काल का है। मामले को सीधे सात जज की बेंच को रेफर किया जाना चाहिए।

ये कहा केंद्र ने
वहीं सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि केंद्र सरकार IPC के बदले भारतीय न्याय संहिता नामक नया बिल लेकर आई है। नए बिल में राजद्रोह का अपराध नहीं रखा गया है। मामला स्टैंडिंग कमिटी को रेफर किया जा चुका है। ऐसे में इस मामले में जब तक कानून नहीं बन जाता है, तब तक मामले की सुनवाई टाली जानी चाहिए। सॉलिसिटर जनरल ने भी कोर्ट से आग्रह किया कि मामले की सुनवाई टाली जानी चाहिए। कहा कि हमने मई 2022 में हलफनामा दिया था और कहा था कि राजद्रोह मामले को केंद्र सरकार हाई लेवल पर दोबारा से परीक्षण कर रही है। सिब्बल ने तब दखल देते हुए कहा कि नया बिल और भी खराब है। अन्य वकील दत्तार ने कहा कि नए बिल में भी राजद्रोह जैसा अपराध शामिल है लेकिन उसे नया नाम दे दिया गया है।

क्या है कानून और बहस का मुद्दा?
IPC की धारा-124A में राजद्रोह को परिभाषित किया गया है। कानून के मुताबिक, कोई भी शख्स किसी तरह से, चाहे बोलकर या लिखकर या किसी संकेत से या फिर दूसरे तरीके से कानून के तहत बने सरकार के खिलाफ विद्रोह या असंतोष जाहिर करता है या कोशिश करता है तो दोषी पाए जाने पर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

कब और किस लिए बनाया गया था कानून?
भारतीय दंड संहिता (IPC) बनाई गई तब उसके मसौदे में राजद्रोह कानून था, लेकिन 1860 में जब IPC आई तो राजद्रोह को हटा दिया गया। लेकिन बाद में ब्रिटिश राज में 1870 में IPC की धारा-124A (राजद्रोह) संशोधन के तहत आया। कानूनी जानकार ज्ञानंत सिंह के मुताबिक, ब्रिटिश सरकार ने अपने शासन काल में भारतीयों की अंग्रेजों के खिलाफ अभिव्यक्ति के तहत असहमति और असंतोष को दबाने के लिए ये प्रावधान किया था।

संविधान सभा में क्यों हुई थी बहस?
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट संजय पारिख बताते हैं कि आजादी के बाद संविधान बनाने के लिए संविधान सभा में ड्राफ्टिंग के वक्त इस पर काफी चर्चा हुई थी। विचार की अभिव्यक्ति की आजादी हमें 19(1) में मिली हुई है। वाजिब रोक 19(2) में है। क्या वाजिब रोक में राजद्रोह को शामिल किया जाए इस पर लंबी बहस हुई। पहले अपवाद में राजद्रोह रखा गया लेकिन शिक्षाविद और ड्राफ्टिंग कमिटी के मेंबर के. एम. मुंशी ने इसके लिए संशोधन प्रस्ताव किया और कहा कि अब भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां जनता की चुनी हुई सरकार है, ऐसे में सरकार को जनता की आलोचना और असहमति का आदर करना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना उसकी आत्मा है।

क्या था केदारनाथ केस में SC का फैसला?
1962 के केदारनाथ सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सरकार की आलोचना या फिर सरकार के प्रति असहमति जताने भर से राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता। राजद्रोह का केस तभी बनेगा जब कोई भी वक्तव्य ऐसा हो जिसमें हिंसा फैलाने की मंशा हो या फिर हिंसा बढ़ाने का तत्व मौजूद हो। यानी सरकार की आलोचना या असहमति जताना राजद्रोह नहीं है। बयान के बाद हिंसा हुई और पब्लिक ऑर्डर खराब हुआ तभी राजद्रोह का मामला बनेगा।

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