टाटा का नाम और भरोसा, फिर भी क्यों नहीं टिक पाया देश का पहला देसी साबुन OK
‘ जो ओके साबुन से नहाए, कमल सा खिल जाए…ओके नहाने का बड़ा साबुन।’ हो सकता है कि आपने से बहुत कम लोगों ने इस धुन को सुना हो, लेकिन एक वक्त था, जब बच्चे-बच्चे इस धुन के बारे में जानते थे। भले ही आज यह भारतीय बाजार से गायब हो गया हो, लेकिन देश को इसने अपना पहला स्वदेशी साबुन दिया था। गुलाम भारत से लेकर आजादी की पहली किरण को इस साबुन ने देखा है। टाटा जैसे बड़े ब्रांड का नाम इससे जुड़ा, हालांकि ये टाटा की दूसरी कंपनियों और ब्रांड की तरह कमाल नहीं दिखा पाया। आज कहानी देश के पहले स्वदेशी नहाने के साबुन OK की।
देश का अपना पहला साबुन
साल 1930 में टाटा ने देश को पहला स्वदेशी साबुन दिया। जमशेद जी टाटा ने साल 1918 में कोच्चि में Tata Oil Mills की फैक्ट्री शुरू की थी। इसी फैक्ट्री में साल 1930 में टाटा ने देश का पहला साबुन बनाया और उसे मार्केट में उतार दिया। साबुन का नाम था ‘OK’। उस वक्त लोग नहाने के लिए साबुन-शैंपू का बहुत कम इस्तेमाल करते थे। ऐसे दौर में जब कि देश में विदेशी कंपनियों का बोलबाला था, टाटा ने देश को अपना पहला साबुन दिया।



