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दिल्ली सर्विस बिल पर राज्यसभा में चर्चा, तंज के हथियार बनीं कविताएं और शायरी, जानें किसने क्या कहा

राज्यसभा में सोमवार को दिल्ली सर्विसेज बिल पर चर्चा के दौरान कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने शायराना अंदाज में अपनी बात रखी। उनके बाद बोलने आए बीजेपी सांसद डॉक्टर सुधांशु त्रिवेदी ने भी स्पीच में शेर-शायरी का खूब इस्तेमाल किया। जब उन्होंने अपना भाषण खत्म किया तो सदन में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने चुटकी लेते हुए कहा कि उधर अगर त्रिवेदी हैं, हमारे यहां चतुर्वेदी हैं। सभापति जगदीप धनखड़ भी यह कहने से नहीं चूके कि अभिषेक मनु सिंघवी आज एक वकील से ज्यादा शायर की तरह बोल रहे थे। आप सांसद राघव चड्ढा भी दिनकर की कविता सुनाने से नहीं चूंके। आइए देखते हैं बिल पर चर्चा के दौरान किसने क्या कहा?

प्रोफेसर मनोज झा क्या स्टूडेंट को भी ऐसे पढ़ाते हैं…शाह ने आरजेडी सांसद पर कसा तंज

गृह मंत्री अमित शाह ने चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि बिल का उद्देश्य केवल और केवल दिल्ली में लोकाभिमुख और भ्रष्टाचारामुक्त शासन है। इतना आश्वस्त करना चाहता हूं कि बिल के किसी भी प्रावधान से पहले की व्यवस्थाओं में कोई फर्क नहीं आएगा। उन्होंने कहा कि जब हम दिल्ली का चुनाव लड़ते हैं तो हमें मालूम होना चाहिए कि ये यूनियन टेरिटरी है। उन्होंने इसके बाद दिल्ली की प्रशासनिक स्थिति और उसके इतिहास की बात की। शाह के कहा कि स्वतंत्रता से पूर्व भी दिल्ली कहीं न कहीं सत्ता का केंद्र रही। 1911 में दिल्ली तहसील और महरौली थाना को मिलाकर राजधानी बनाया। बाद में 1919 और 1935 के अधिनियम में दिल्ली को अंग्रेजों ने चीफ कमिश्नर स्टेट बनाया। उन्होंने कहा कि बाद में जब संविधान बनने की प्रक्रिया बनी तो दिल्ली के स्टेटस के बारे में पट्टाभिसीतारमैया और डॉक्टर आंबेडकर की एक समिति बनी। सीतारमैया ने दिल्ली को लगभग राज्य का दर्जा देने की सिफारिश की। लेकिन चर्चा के दौरान पंडित नेहरू, सरदार पटेल, सी राजगोपालाचारी, राजेंद्र प्रसाद और खुद आंबेडकर जैसे तमाम नेताओं ने अलग-अलग तर्क देकर इसका विरोध किया। आंबेडकर की रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली की जो प्रकृति है, उसे देखते हुए शायद ही उसे किसी अन्य स्थानीय प्रशासन के तहत रखा जाएगा। किसी विशेष क्षेत्र के बारे में क्या करना है, ये राष्ट्रपति अपने विवेक के अधिकार पर काम करेंगे, जिम्मेदार मंत्रियों की सलाह पर। इस दौरान आरजेडी सांसद मनोज झा पर तंज कसते हुए शाह ने कहा कि अगर आप स्टूडेंट को भी यही पढ़ाते होंगे तो उनकी बुरी गति है। उन्होंने कहा कि मनोज जी ने कहा कि कोटेशन को पढ़ाता हूं। मनोज जी अगर आप इसी तरह का कोटेशन का इंटरप्रिटेशन जेएनयू में पढ़ाते होंगे तो विद्यार्थियों की बुरी गत हो जाती होगी। भौगोलिक स्थिति और राजधानी का अस्तित्व है। दिल्ली राजधानी क्षेत्र है, इसीलिए कमिटी इसे पूर्ण राज्य नहीं बनाना चाहती। मनोज जी, क्या दिल्ली आ राजधानी नहीं है। कुछ सत्य सनातन होते हैं जो बदलते नहीं हैं। शाह ने कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि ये राष्ट्रीय राजधानी है। आजादी के बाद वर्ष 1951 में दिल्ली को सीमित अधिकारों के साथ विधानसभा दी गई। वर्ष 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली विधानसभा भंग कर दी गई और इसे संघशासित प्रदेश बना दिया गया। 1987 में सरकारिया कमिटी बनी जो बाद में बालकृष्ण कमिटी में परिवर्तित हुई। कमिटी ने 1993 में सिफारिश दी। जिसके बाद 69वां संविधान संशोधन हुआ जिसमें संविधान में आर्टिकल 239 AA डाला गया और दिल्ली को विशेष दर्जा दिया गया। विधानसभा फिर से बहाल हुई। इसलिए ये भाषण देना कि आज दिल्ली की बारी है कल ओडिशा की बारी है, कल आंध्र प्रदेश की बारी है, ये कहना गलत है।

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