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क्या सियासत के योद्धा शरद पवार ने अबकी बार खूंटी पर टांग दिए हैं हथियार? रुकिए जरा…आगे 2024 है!

आर जगन्नाथन
शरद पवार कब-क्या कर सकते हैं, ये सामान्य नहीं है। इसकी भविष्यवाणी मुश्किल है। वह मौकों को भुनाने के मामले में भारत के सबसे ज्यादा व्यावहारिक राजनेता हैं। एनसीपी के संस्थापक ने मंगलवार को अपनी पार्टी समेत सभी को तब चौंका दिया जब उन्होंने ऐलान किया कि वह अब पार्टी की बागडोर नहीं संभालेंगे। अगर मान लिया जाए कि वह अपने फैसले पर अडिग रहते हैं तो उनका फैसला 2 अनसुलझे सवाल खड़ा कर रहा।

पहला सवाल उनकी अपनी पार्टी में नेतृत्व का अनसुलझा मुद्दा है। उनकी बेटी सुप्रिया सुले और भतीजे अजित पवार तगड़े दावेदार के रूप में दिख रहे हैं। दूसरा सवाल, राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा है। शरद पवार महाविकास अघाड़ी के अध्यक्ष हैं। वह विपक्ष के भीष्म पितामह हैं। उनके इस्तीफे से बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों का मोर्चा बनाने की कोशिशों को झटका लग सकता है।लेकिन इस बात की गुंजाइश ज्यादा है कि पवार की घोषणा पार्टी को एकजुट करने और नई पीढ़ी को सहज ढंग से नेतृत्व की विरासत सौंपने की उनकी योजना का हिस्सा हो। राष्ट्रीय स्तर पर, वह खुद को 2024 में एक संभावित कैंडिडेट के तौर पर पेश कर रहे हैं। अगर त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति आई तो विपक्ष में उनके नाम पर सर्वसम्मति हो सकती है।

शरद पवार 82 साल के हैं। लेकिन अब उनकी सियासी पारी खत्म हो चुकी है, ऐसा मानना बड़ी गलती होगी। अतीत में वह कई बार सियासी तौर पर और मजबूत होकर उभरे हैं। कभी सत्ता के केंद्र के तौर पर उभरे तो कभी उसके आसपास पहुंचे।

कांग्रेस-ब्रैंड सेक्युलर पॉलिटिक्स में व्यक्तिगत रुझान के बावजूद शरद पवार के व्यक्तित्व का सबसे अहम पहलू ये है कि तकरीबन हर राजनीतिक दल में उनके दोस्त हैं। वैचारिक तौर पर बीजेपी के कट्टर विरोधी होने के बावजूद उनके नरेंद्र मोदी से अच्छे संबंध हैं। जब भी उन्हें सियासी तौर पर मुफीद लगता है वह विपक्षी दलों के रुख से अलग राह भी अपना लेते हैं। अभी हाल में उन्होंने गौतम अडानी के बिजनस की जांच के लिए जेपीसी के गठन की जरूरत पर सवाल उठाया था। पवार को आमतौर पर प्रो-बिजनस माना जाता है। वह किसी बिजनसमैन को सिर्फ राजनीतिक वजहों से नुकसान पहुंचाने के खिलाफ हैं।

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