हिमालय से पुरानी पहाड़ी पर अंग्रेजों की योजना कैसे हुई फेल, बड़ा तालाब ‘बड़ा’ क्यों नहीं हो पाया? जानें
रांची: रांची पहाड़ी के बारे में भू-वैज्ञानिकों का दावा है कि यह हिमालय से भी पुरानी है। इस ऐतिहासिक पहाड़ी के चारों ओर अंग्रेज अंधिकारी कर्नल ओन्सले ने तालाब बनाने की योजना बनाई थी। यदि 1842 में उस अंग्रेज अधिकारी की योजना सफल हो जाती, तो रांची पहाड़ी का दृश्य अपने आप में मनोरम और रम्य होता। चारों तरफ सागर जैसा तालाब का विस्तार दिखाई देता और बीच में एक द्वीप के सामान रांची पहाड़ी पर स्थित शिव मंदिर का नजारा होता। लेकिन अंग्रेज अधिकारी की वह योजना अधूरी रह गई। रांची पहाड़ी के एक ही हिस्से में बड़ा तालाब का निर्माण हो गया, लेकिन तीन तरफ बड़ा तालाब बनाने की योजना पूरी नहीं हो पाई। इस तालाब को बनाने में अंग्रेजी शासन के कैदियों की भी मदद ली। एक हिस्से में जिस तालाब का निर्माण अंग्रेज अधिकारी ने कराया था, वो तालाब 180 साल बाद आज भी शहर का सबसे बड़े तालाब के रूप में प्रसिद्ध है।
बड़ा तालाब निर्माण में कैदियों की बड़ी भूमिका रही
रांची बड़ा तालाब का निर्माण ब्रिटिश कर्नल ओन्सले ने 1842 में कराया, जिसमें कैदियों की मदद ली गई थी। बाद में इस बड़ा तालाब की ख्याति झील के रूप में भी है। इस झील की ऊंचाई समुद्र तल से 2100 फीट है। कहा जाता है कि अंग्रेजी शासन में सारे कैदियों को सुबह में भोजन देने के बाद झील की खुदाई के लिए लाया जाता था और शाम में काम खत्म होने के बाद ही उन्हें भोजन दिया जाता था। इस तरह से सिर्फ दो शाम भोजन ही कैदियों को नसीब था और उसके बदले उनसे कड़ी मेहनत कराई जाती थी। इसी कारण कुछ ही महीनों में एक हिस्से में इतने बड़े तालाब का निर्माण कराने में सफलता मिल गई, जिसकी ख्याति झील के रूप में हो गई। हालांकि अंग्रेज कर्नल की मंशा रांची पहाड़ी के चारों ओर झील बनाने की पूरी नहीं हो सकी। लेकिन यह बड़ा तालाब शहर के लिए लंबे समय तक एक सेंटर के रूप में रहा। जिसके आसपास खाली मैदान और खेत से लोगों की दिनचर्या शुरू होती थी। बाद में इसी तालाब में लोग स्नान कर अपने घर जाते थे। इसी तालाब का पानी भी आसपास के लोग अपने घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए ले जाते थे। उस वक्त सिर्फ संपन्न घर के लोगों के पास ही अपना कुआं होता था। तब चापाकल की कल्पना भी लोग नहीं करते थे। नदी-तालाब और खेत में जमे पानी से ही सारी जरूरतें पूरी होती थी। बाद में आम लोगों की सुविधा के लिए रांची झील के एक हिस्से में पालकोट राज के नागवंशी शासक कुंवर श्रीनाथ शाहदेव ने 1845 में कराया था। दो-चार साल नहीं, बल्कि डेढ़ सौ साल से अधिक समय तक रांची के जीवन में बड़ा तालाब का महत्वपूर्ण स्थान रहा। पहले हरमू श्मशान घाट में शवदाह करने के बाद लोग अनिवार्यतः इस तालाब में स्नान करने के बाद ही अपने-अपने घरों को जाते थे। यह तालाब इतना बड़ा और विस्तृत है कि किसी भी दिशा की ओर जाने वाले व्यक्त को यहां से स्नान करके अपने घर जाने में कोई असुविधा नहीं होती थी। इस तालाब के एक किनारे पालकोट राजा की ओर से बनवाया गया पक्का घाट अब भी है, जिसके ऊपर छत भी है। यहां दशकर्म की सारी विधियां संपन्न की जाती थी। जबकि अंधेरा होते ही यह इलाका सुनसान होता था। कभी-कभी इस तालाब में लाशें भी तैरती दिखाई पड़ जाती थीं।




