झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग में चल रहे अवैध पत्थर खनन मामले पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने प्रशासनिक एजेंसियों की कार्यशैली पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि अवैध खनन से पर्यावरण और लोगों की सुरक्षा दोनों खतरे में हैं। सवानी नदी और आसपास के इलाकों में लगातार अवैध गतिविधियां चल रही थीं। कोर्ट ने माना कि प्रशासन समय पर कार्रवाई करने में विफल रहा है। खंडपीठ ने जिला प्रशासन, पुलिस और खनन विभाग को जिम्मेदार ठहराया। अदालत ने कहा कि खेती योग्य जमीन लगातार खराब हो रही है। नदी का पारिस्थितिक संतुलन भी तेजी से प्रभावित हो रहा है। कोर्ट ने इसे गंभीर पर्यावरणीय संकट बताया है। साथ ही अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाये गये हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल कागजी कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा। अदालत ने अधिकारियों की निष्क्रियता को सार्वजनिक कर्तव्य की विफलता बताया। कोर्ट के अनुसार बड़े स्तर पर अवैध खनन अधिकारियों की जानकारी के बिना संभव नहीं है। भारी मशीनरी और ट्रकों के संचालन के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई। जिला स्तरीय टास्क फोर्स को नियमित निगरानी करने को कहा गया है। टास्क फोर्स को सभी लाइसेंस और स्वीकृतियों की जांच करनी होगी। जांच पूरी होने तक खनन गतिविधियों पर रोक लगाने का आदेश दिया गया है। कोर्ट ने सभी रिपोर्ट सार्वजनिक करने का निर्देश भी दिया। इससे प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश की गई है।
अदालत ने वाइल्डलाइफ सेंचुरी के आसपास खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध बरकरार रखा है। कोर्ट ने तकनीक के इस्तेमाल से निगरानी मजबूत करने का आदेश दिया। सीसीटीवी और जीपीएस आधारित निगरानी लागू की जाएगी। शिकायत दर्ज कराने के लिए हेल्पलाइन और ईमेल शुरू करने का निर्देश मिला है। जिला खनन विभाग को अवैध खनन करने वालों पर कार्रवाई करनी होगी। पुलिस को समयबद्ध जांच कर आरोप पत्र दाखिल करने का आदेश दिया गया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अवैध इकाइयों को बंद कराने का निर्देश मिला है। कोर्ट ने पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए मुआवजा लगाने की बात कही। बंद खदानों को सुरक्षित करने और पुनर्स्थापना का भी आदेश दिया गया। अदालत ने कहा कि आदेशों की अनदेखी करने वाले अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।


