झारखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला: तलाक के लिए केवल शारीरिक अलगाव नहीं, स्थायी इरादा ज़रूरी |
पुलिस अधिकारी अरुण कुमार की याचिका खारिज, कोर्ट ने परित्याग की परिभाषा को किया स्पष्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में साफ कर दिया है कि तलाक के लिए परित्याग (desertion) का दावा केवल शारीरिक अलगाव के आधार पर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि परित्याग तभी माना जाएगा जब पति या पत्नी में से कोई एक साथी स्थायी रूप से वैवाहिक संबंध को समाप्त करने का स्पष्ट इरादा रखता हो।
यह निर्णय हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति राजेश कुमार की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने इस दौरान पुलिस अधिकारी अरुण कुमार की ओर से दायर तलाक याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने परित्याग को आधार बनाते हुए विवाह विच्छेद की मांग की थी।
याचिका में अरुण कुमार ने दावा किया था कि उनकी पत्नी लंबे समय से उनसे अलग रह रही हैं, इसलिए यह परित्याग का मामला है और उन्हें तलाक दिया जाना चाहिए। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शारीरिक दूरी इस बात का प्रमाण नहीं है कि किसी का इरादा विवाह समाप्त करने का है। जब तक यह सिद्ध न हो कि अलग रहने वाला साथी जानबूझकर और स्थायी रूप से विवाह से मुक्ति चाहता है, तब तक इसे परित्याग नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक संबंधों में सिर्फ दूरी नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर अलगाव परिस्थितियों या अस्थायी कारणों से हुआ हो और उसमें विवाह को खत्म करने का इरादा न हो, तो उसे कानूनी रूप से परित्याग नहीं कहा जा सकता।
यह फैसला विवाह से जुड़े मामलों में कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है और यह भी सुनिश्चित करता है कि तलाक जैसे गंभीर फैसलों को हल्के में न लिया जाए। यह निर्णय उन तमाम दंपतियों के लिए एक मिसाल बन सकता है जो बिना ठोस कारण के तलाक की मांग करते हैं।



