झारखंड हाईकोर्ट ने लंबे समय से लंबित हत्या मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने तीनों आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि न्याय के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक होते हैं। केवल एक गवाह की गवाही को पर्याप्त नहीं माना गया। खंडपीठ ने सभी तथ्यों की विस्तार से समीक्षा की। अदालत ने अभियोजन की कहानी पर संदेह जताया। न्यायालय ने कहा कि संदेह से परे अपराध साबित होना चाहिए। फैसले से आरोपियों को बड़ी कानूनी राहत मिली। अदालत ने न्यायिक संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया। इस निर्णय को महत्वपूर्ण न्यायिक उदाहरण माना जा रहा है।
खंडपीठ ने 1998 के दोषसिद्धि आदेश को निरस्त कर दिया। सजा आदेश भी रद्द कर दिया गया। अदालत ने कहा कि आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे। आरोपियों को तुरंत राहत दी गई। बेल बांड की शर्तों से भी उन्हें मुक्त किया गया। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए केस समाप्त किया। न्यायालय ने निष्पक्ष सुनवाई की आवश्यकता बताई। फैसले में साक्ष्य की विश्वसनीयता पर चर्चा हुई। कोर्ट ने न्याय के सिद्धांतों को प्राथमिकता दी। यह निर्णय लंबे कानूनी संघर्ष का अंत साबित हुआ।
घटना वर्ष 1996 की बताई गई थी। सोनाहातु थाना क्षेत्र में हत्या की वारदात हुई थी। मृतक बिशंभर सिंह मुंडा पर धारदार हथियारों से हमला हुआ था। जमीन विवाद को घटना का कारण बताया गया था। निचली अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी ठहराया था। उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। मामले ने वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया देखी। हाईकोर्ट ने साक्ष्य के अभाव को मुख्य कारण माना। अदालत ने कहा कि न्याय संदेह पर नहीं बल्कि प्रमाण पर आधारित होता है। फैसले के साथ पुराना मामला समाप्त हो गया।



