रांची: झारखंड के उत्तर छोटानागपुर प्रमंडल में स्थित है, जहां स्थानीय गैर-आदिवासी समुदायों के बीच खोरठा और मैगही भाषा का व्यापक प्रचलन देखने को मिलता है। उत्तर छोटानागपुर प्रमंडल के तहत आने वाले हजारीबाग, धनबाद और कोडरमा जैसे जिलों में भी खोरठा भाषा का व्यापक असर है। खोरठा को मैगही भाषा का ही एक स्वरूप माना जाता है, जिसमें स्थानीय बोलियों और संस्कृति का अनूठा मेल देखने को मिलता है। रांची के बाजारों, सार्वजनिक स्थलों और ग्रामीण इलाकों में खोरठा और मैगही के शब्दों का उपयोग आम बात है।
भाषाविदों के अनुसार, खोरठा भाषा का उद्गम बिहार की मैगही भाषा से हुआ है। हालांकि, झारखंड के स्थानीय परिवेश और सांस्कृतिक प्रभावों के कारण खोरठा ने एक अलग पहचान बना ली है। स्थानीय लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और जनसंवाद में खोरठा का उपयोग न केवल संचार का माध्यम है, बल्कि यह स्थानीय पहचान का प्रतीक भी बन चुका है।
रांची के समाजशास्त्री डॉ. राजेश कुमार का कहना है कि, “खोरठा भाषा में स्थानीय शब्दावली और उच्चारण का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि इसे मैगही से अलग एक स्वतंत्र भाषा के रूप में देखा जाता है। स्थानीय संस्कृति और रीति-रिवाजों में इसका गहरा असर है।”
हालांकि, बदलते समय के साथ शहरीकरण और नई पीढ़ी की आधुनिक शिक्षा प्रणाली के कारण खोरठा और मैगही के प्रभाव में थोड़ी कमी देखी जा रही है। फिर भी, गांवों और कस्बों में इन भाषाओं का प्रभाव अब भी मजबूत बना हुआ है।
प्रशासन और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा खोरठा और मैगही के संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं। विद्यालयों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने की पहल से इस क्षेत्र की भाषाई विरासत को संरक्षित रखने की कोशिश की जा रही है। रांची में खोरठा और मैगही की यह मिश्रित पहचान यहां की सांस्कृतिक विविधता को और समृद्ध बना रही है।



