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पाकिस्तान में फिर तोड़ी गई अहमदियों की मस्जिद, इस्लाम के नाम पर बने देश में ‘मुसलमानों’ में भेदभाव क्यों?

पाकिस्तान के कराची में अहमदी समुदाय से जुड़ी एक मस्जिद को तोड़ दिया गया है। अहमदी खुद को मुसलमान बताते हैं, लेकिन पाकिस्तान में उन्हें मुसलमान नहीं माना जाता है। अहमदी समुदाय की यह मस्जिद कराची के ड्रिघ रोड पर बनी हुई है। इस मस्जिद की दीवारों पर कालिख भी पोती गई है। जमात-ए-अहमदिया के प्रवक्ता आमिर महमूद के एक बयान में कहा गया है कि सोमवार दोपहर करीब 3:45 बजे एक दर्जन लोग मस्जिद में घुस आए। महमूद ने कहा कि लोगों ने हथौड़ों से मीनारों को नष्ट कर दिया और दीवारों पर कालिख पोत दिए।

इस साल अहमदी समुदाय पर 11वां हमला

महमूद ने कहा कि इस साल अहमदी समुदाय की मस्जिद पर यह 11वां हमला है। इस साल जनवरी में, कराची में दो हफ्ते के अंतराल में दो मस्जिदों पर इसी तरह से हमला किया गया और तोड़फोड़ की गई। बयान में कहा गया है कि बैत उल मुबारिक नाम की जिस मस्जिद पर सोमवार को हमला हुआ, वह पाकिस्तान के निर्माण के बाद से ही अस्तित्व में थी। वहीं पुलिस का दावा है कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद अहमदियों ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई है।

हमलावरों ने चेहरों को किया था कवर

अहमदियों की जिस मस्जिद पर हमला हुआ, वह शाह फैसल पुलिस स्टेशन की सीमा के भीतर आता है। शाह फैसल थाने की पुलिस ने बताया कि मस्जिद पर हमला शाम चार बजे के आसपास किया गया। हालांकि, पुलिस का दावा है कि इस हमले में दर्जनभर की जगह सिर्फ चार से पांच लोग ही शामिल थे। पुलिस ने बताया कि कुछ लोगों ने हेलमेट पहन रखा था जबकि अन्य ने अपना चेहरा कपड़े से ढक रखा था। उन्होंने बताया कि अज्ञात लोग सीढ़ी के सहारे मस्जिर की गुंबद पर चढ़ गए थे।

पुलिस का दावा- अवैध रूप से बनी थी मीनार

पुलिस ने यह भी बताया कि अहमदी समुदाय ने अनुमति नहीं होने के बावजूद मस्जिद में एक गुंबद बनाया हुआ था। हमलावरों ने इसे नष्ट कर दिया और फिर भाग गए। पुलिस ने कहा कि अहमदी समुदाय से कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है, जबकि पुलिस ने उनसे बार-बार ऐसा करने का अनुरोध किया था। हालांकि, समुदाय ने कहा कि उन्होंने घटना की पूरी जानकारी के साथ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने यह भी कहा कि मस्जिद पर हमले का सीसीटीवी वीडियो भी पुलिस को सौंप दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि इमारत 1948 से अस्तित्व में है, जबकि मीनारें 1955 में जोड़ी गईं।

अहमदियों के पूजा स्थल को मस्जिद नहीं कह सकते

1974 के एक संवैधानिक संशोधन में परिभाषित किया गया कि किसे मुस्लिम कहा जा सकता है और किसे गैर-मुस्लिम। जो कोई भी पैगंबर मोहम्मद की भविष्यवाणी की अंतिमता में विश्वास नहीं करता, वह मुसलमान नहीं है। संशोधन में विशेष रूप से कहा गया है कि “कादियानी समूह या लाहौरी समूह के व्यक्ति (जो खुद को ‘अहमदी’ कहते हैं)” गैर-मुस्लिम हैं। बाद में 1984 में, 1984 के अध्यादेश में अहमदियों को उनके पूजा स्थल को “मस्जिद” कहने और उनके विश्वास का प्रचार करने से रोक दिया। उसी कानून के विस्तार में, 1993 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया कि अहमदियों को मुस्लिम पहचान से जुड़ी चीजों का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

मीनारों के भी बनाने पर है प्रतिबंध

कानून की व्याख्या के अनुसार, अहमदी न तो पूजा स्थलों को मस्जिद कह सकते हैं और ना ही अजान के रूप में पूजा कर सकते हैं। इसका मतलब यह भी है कि अहमदी मीनारों का उपयोग नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वे मुस्लिम पूजा स्थलों से जुड़े हुए हैं। हालांकि, अहमदियों का कहना है कि मीनारें एशियाई वास्तुकला की एक विशेषता हैं जो हिंदू मंदिरों में भी पाई जाती हैं। दूसरे पक्ष का तर्क है कि मीनारें संकेत देती हैं कि कई अहमदी पूजा स्थल वास्तव में मुस्लिम मस्जिदें थीं जिन्हें नए धर्म के लागू होने पर अवैध रूप से हथिया लिया गया है।

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