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सामने घायल पति, अंग्रेज बरसा रहे थे गोलियां, फिर भी नहीं झुकने दिया तिरंगा, बहादुर तारा रानी श्रीवास्तव की कहानी

आजादी को 75 साल पूरे हो चुके हैं। देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। जब भी देश के आजादी की बात होती है, चेहरे के सामने असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान याद आता है। इतिहास की किताबों में कुछ का जिक्र है तो कुछ तो समय के साथ भुला दिए गए। इतिहास के पन्नों में उनका जिक्र शायद ही हुआ हो। यही वजह है कि हम हमारी सीरीज के माध्यम से ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानियों की चर्चा करते हैं। उनके बलिदान की कहानी सुनाते हैं। इसी कड़ी में आज हम एक ऐसी महिला क्रांतिकारी की जिसके बलिदान की कहानी सुन आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। उस महिला का नाम था तारा रानी श्रीवास्तव। आपमें से कई लोगों ने उसका नाम नहीं सुना होगा। क्योंकि स्कूल की किताबों और बाकी जगहों पर कहीं भी उनकी वीरता की कहानी का उल्लेख नहीं है।1942 में भारत छोड़े आंदोलन के समय महात्मा गांधी के साथ जुलूस में शामिल थीं। हाथ में तिरंगा लिए आजादी की लौ उनके अंदर जल रही थी। यही वजह थी कि पति के घायल होने के बाद भी उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे और हौसला बुलंद रखा। आइए जानते हैं तारा रानी श्रीवास्तव के बलिदान क कहानी-

बिहार में जन्म, कम उम्र में विवाह
तारा रानी श्रीवास्तव के शुरुआती जीवन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती। जुटाई जानाकारी के अनुसार, तारा रानी का जन्म बिहार के सारण में हुआ था। कम उम्र में ही उनका विवाह फुलेंदु बाबा से हो गया था। फुलेंदु बाबू भी उस समय स्वतंत्रतता सेनानी थे। उन दिनों वह अंग्रेजों के खिलाफ जुलूस निकाला करते थे। महात्मा गांधी को बहुत मानते थे। उनकी शिक्षा का अनुसरण करते थे। यही वजह रही कि तारा रानी श्रीवास्तव के अंदर आजादी की ललक उनके पति से ही मिली

पाबंदियों के बंधनों को तोड़ा
जिस समय तारा रानी श्रीवास्तव के अंदर देश की आजादी के लिए कुछ कर गुजरने की चाह पनप रही थी, उस वक्त महिलाओं को लेकर पबांदियां भी थीं। उन्हें चाहरदीवारी के अंदर कैद रखता था और बाहर आजादी से घूमने की छूट नहीं थी। लेकिन तारा रानी श्रीवास्तव ने इन सभी पाबंदियों को एक किनारे कर देश की आजादी के लिए निकल पड़ीं। इसमें तारा रानी को पति फुलेंदु बाबू से मदद मिली। उनकी इस मामले में सोच अलग थी। तारा रानी ने अपने साथ कई महिलाओं को इकट्ठा किया, प्रोत्साहित किया और महात्मा गांधी के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश की।

पुलिस स्टेशन पर तिरंगा फहराने की कोशिश
तारा रानी श्रीवास्तव 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के साथ जुड़ गईं। महात्मा गांधी की टीम में शामिल तारा रानी और उनके पति फुलेंदु बाबू कई तरह के विरोध प्रदर्शनों और जुलूस में शामिल हो हो गए। 12 अगस्त 1942 को तारा रानी के पति फुलेंदु बाबू ने एक जुलूस निकाला। सिवान के पुलिस स्टेशन पर तिरंगा झंडा फहराने की योजना था। आजादी की अलख लिए इस भीड़ को रोकना अंग्रेजों के लिए आसान नहीं था। भीड़ से परेशान अंग्रेज अफसरों ने लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। लाठीचार्ज के साथ निहत्थे लोगों पर गोलियां चलानी शुरू कर दी। अंग्रजों की गोलियों से फुलेंदु बाबू घायल हो गए।

घायल पति को देख भी नहीं डिगे कदम
तारा रानी श्रीवास्तव के सामने एक तरफ घायल पति था तो दूसरी तरफ तिरंगा फहराने का लक्ष्य। तारा रानी के लिए वह समय काफी कठिन था। तारा रानी ने साड़ी का कपड़ा फाड़कर फुलेंदु बाबू की मलहम पट्टी की। इसके बाद अपने पति को घायल अवस्था में छोड़ दिल पर पत्थर रखकर आगे बढ़ी और सिवान पुलिस स्टेशन में तिरंगा झंडा फहराकर ही दम लिया। इसके बाद जब वह लौटीं तब तक उनके पति फुलेंदु बाबू की मौत हो चुक थी। पति की मौत के बाद भी तारा रानी श्रीवास्तव देश को आजादी के लक्ष्य को जीवित रखा। 5 साल बाद तारा रानी ने देश को आजाद कराकर ही दम लिया। आज भी देश उनके इस योगदान पर फक्र महसूस करता है।

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