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झारखंड का छह हजार साल पुराना श्रीयंत्र के आकार वाला मंदिर, यहां की तंत्र साधना कभी खाली नहीं जाती

जंगलों, पहाड़ियों और नदियों से घिरा क्षेत्र, जगह-जगह साधना करते लोग, मंत्रोच्चार से गूंजता वातावरण, हवन कुंडों से उठती ज्वाला। यह रजरप्पा है। यहां है करीब छह हजार साल पुराना बताया जाने वाला मां छिन्नमस्तिका का मंदिर। पौराणिक आख्यानों के साथ-साथ साधकों-तपस्वियों की मान्यता है कि छिन्नमस्तिका का यह धाम असम के कामरूप कामाख्या के बाद दूसरे सबसे जागृत शक्तिपीठ है। हर साल की तरह इस बार भी शारदीय नवरात्र पर तप-साधना के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से भक्तों, तंत्र साधकों और अघोरियों का जुटान हुआ है। रांची से करीब 85 किलोमीटर दूर रजरप्पा में हर नवरात्रि और अमावस्या की तिथि में यहां पूरे देश भर से शक्ति यानी देवी के उपासक जुटते हैं। इनमें सबसे ज्यादा तादाद झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के साधकों की होती है।

श्रीयंत्र के आकार वाला 6 हजार साल पुराना मंदिर

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार यह स्थान मेधा ऋषि की तपस्थली के रूप में जाना जाता रहा है। हालांकि उनसे जुड़ा कोई भौतिक अवशेष यहां नजर नहीं आता। यह मंदिर दामोदर नद और भैरवी नदी के संगम के किनारे त्रिकोण मंडल के योनि यंत्र पर स्थापित है, जबकि पूरा मंदिर श्रीयंत्र के आकार में है। मंदिर के एक पुजारी शुभाशीष पंडा के अनुसार, मां छिन्नमस्तिके को पौराणिक ग्रंथों में बताए गए 10 महाविद्या में से एक माना जाता है। यह देवी का रौद्र स्वरूप है। मंदिर में उत्तरी दीवार के साथ रखे शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए छिन्नमस्तिका की प्रतिमा स्थित है। कुछ साल पहले मूर्ति चोरों ने यहां मां की असली प्रतिमा को खंडित कर आभूषण चुरा लिए थे। इसके बाद यह प्रतिमा स्थापित की गई।

मां के इस रूप की महिमा ही अद्भुत

पुरातत्ववेत्ताओं की मानें तो पुरानी अष्टधातु की प्रतिमा 16वीं-17वीं सदी की थी, उस लिहाज से मंदिर उसके काफी बाद का बनाया हुआ प्रतीत होता है। मुख्य मंदिर में चार दरवाजे हैं और मुख्य दरवाजा पूरब की ओर है। शिलाखंड में देवी की सिर कटी प्रतिमा उत्कीर्ण है। इनका गला सर्पमाला और मुंडमाल से शोभित है। बाल खुले हैं और जिह्वा बाहर निकली हुई है। आभूषणों से सजी मां नग्नावस्था में कामदेव और रति के ऊपर खड़ी हैं। दाएं हाथ में तलवार और बाएं हाथ में अपना कटा मस्तक लिए हैं। इनके दोनों ओर मां की दो सखियां डाकिनी और वर्णिनी खड़ी हैं। देवी के कटे गले से निकल रही रक्त की धाराओं में से एक-एक तीनों के मुख में जा रही है। मंदिर के गुम्बद की शिल्प कला असम के कामाख्या मंदिर के शिल्प से मिलती है।

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