अब जीव-जंतुओं के भी डीएनए का आसानी से हो जाएगा खुलासा, झारखंड से इस युवा साइंटिस्ट ने डेवलप की खास नैनो टेक्नोलॉजी
रांचीः आधुनिक विज्ञान और डीएनए जांच से वर्तमान समय में गंभीर बीमारियों का उपचार संभव हो रहा हैं। अब युवा साइंटिस्ट राहुल कुमार ने जीव-जंतुओं के डीएनए का भी पता लगाने के नैनो टोक्नोलॉजी की खोज की है। नई तकनीक जीव-जंतुओं के बेहतर इलाज, उनको हुए परजीवी संक्रमण का पता लगाने या खेतों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े-मकोड़ों को पहचानने में सहायक होगी। यह तकनीक मात्र रंग परिवर्तन के माध्यम से दो जीवों के डीएनए में अंतर बताने में सक्षम है। सिर्फ देखकर ही बता पाना संभव होगा कि ये डीएनए किस प्रजाति का है और किसका नहीं। इसलिए इसका उपयोग काफी सरल है।
नई तकनीक से जीव-जंतुओं के डीएनए का पता लगाना हुआ आसान
मगध विश्वविद्यालय के शिवदेनी साव महाविद्यालय, कलेर में प्राणी विज्ञान विभाग के सहायक प्राचार्य राहुल कुमार ने इस तकनीक की खोज की हैं। वे हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय, में प्राणी विज्ञान विभाग के सह प्राचार्य डॉ. अजय कुमार शर्मा के पर्यवेक्षण में शोध कार्य भी कर रहे हैं। इस शोध के दौरान युवा वैज्ञानिक राहुल कुमार ने पाया कि नैनोगोल्ड का उपयोग आणविक हस्ताक्षरों के आधार पर पशु प्रजातियों का पता लगाने के लिए किया जा सकता है।राहुल कुमार का कहना है कि नैनोगोल्ड का चिकित्सा विज्ञान में काफी उपयोग हैं। नैनोगोल्ड कई बीमारियों का पता लगाने में और इन बीमारियों का इलाज ढूंढने में सहायक है। उन्होंने कहा कि अब तक बहुकोशिकीय जीवों के वैज्ञानिक वर्गीकरण से जुड़े अध्ययनों में नैनोगोल्ड का ज्यादा उपयोग नहीं किया गया। लेकिन नैनोगोल्ड में बहुकोशिकीय जीवों की प्रजाति का पता लगाने और उनके वैज्ञानिक वर्गीकरण के क्षेत्र में असीमित संभावनाएं हैं। इस संबंध में, उन्होंने 20 नैनो-मीटर से भी छोटे सोने के नैनोकणों को संश्लेषित किया है। इस कार्य के लिए उन्होंने नई दिल्ली स्थित एम्स अस्पताल के इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी सुविधा और नेनोटेक्नोलॉजी लैब की मदद ली है। एक छोटे आकार के थिओलेटेड डीएनए और नैनोगोल्ड के बीच के आकर्षण के आधार पर यह विधि विकसित की गई है।




