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‘हीरो’ बनकर आया मस्त गुल श्मशान बनाकर चला गया, चरार-ए-शरीफ की खौफनाक कहानी

शायद आपने चरार-ए-शरीफ के बारे में सुना हो। यह पवित्र दरगाह कश्मीर के बडगाम में है। मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने वहां जाकर मत्था टेका। पवित्र धर्मस्थल की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर आई हैं। जिनका बचपना 90 के दशक में बीता होगा, शायद उन्हें चरार-ए-शरीफ का वो भयावह मंजर भी याद हो। तब अखबारों में जले हुए सामान, खंडहर हो चुके घरों की तस्वीरें छपी थीं। सब कुछ उजड़ गया था। कहा जाता है कि जब मस्त गुल चरार-ए-शरीफ में आया था तो कई लोगों ने जश्न मनाया था लेकिन जब लौटा तो पूरा कस्बा श्मशान बन चुका था। लोग जब अपनों को खोजने लगे तो जली हुई लाशें मिली थीं। वो 1995 का गर्मी का मौसम था। तड़के दरगाह में आग लगी थी। आसपास ज्यादातर घर लकड़ियों के थे। ऐसे में आग धधकने लगी और चौतरफा ऊंची लपटें उठने लगीं। न तो आग बुझाने का टाइम मिला न जान बचाने का क्योंकि एक तरफ आग धधक रही थी तो दूसरी तरफ आतंकी गोलियां बरसा रहे थे। कई लोगों ने अपनों को खोया था।

इसके पीछे एक परदेसी का हाथ था। नाम था हारून खान उर्फ मस्त गुल। अफगानिस्तान से ताल्लुक रखने वाला वह दहशतगर्द सर्दियों में पाकिस्तान से आया था। 15वीं शताब्दी के सूफी संत शेख नूरुद्दीन नूरानी की दरगाह में आतंकियों ने शरण ली थी। इन्हीं का सरगना था मस्त गुल। 12 नवंबर 1994 को उसका करीबी शाहिद लतीफ गिरफ्तार हुआ था लेकिन पुलिस और एजेंसियों को भनक नहीं लगी कि आतंकी किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने में लगे हैं।

पाक इंजीनियर भी हथियार लेकर आया था

यह जगह कश्मीर से 18 किमी दूर है। जिस सूफी संत की यह दरगाह है उन्हें अलमदार ए कश्मीर कहा जाता है लेकिन पाकिस्तानी आतंकियों ने न सिर्फ अमन-चैन में खलल डाली बल्कि घाटी में आग लगा दी। मस्त गुल जब सर्दियों में 700 साल पुराने धर्मस्थल आया था तब सालाना उर्स काफी प्रसिद्ध हुआ करता था। गुल और उसके लड़ाकों ने स्थानीय आतंकियों के साथ मिलकर लोगों में यह भरोसा पैदा किया कि वह हर हाल में दरगाह की सुरक्षा करेगा। उसके साथ आए आतंकियों में कुछ काफी पढ़े-लिखे थे। इनमें से एक कराची यूनिवर्सिटी का टॉपर केमिकल इंजीनियर भी था। धीरे-धीरे पूरा इलाका आतंकियों का गढ़ बन गया और तनाव बढ़ने लगा। 8 दिसंबर 1994 को सेना ने चरार में ऑपरेशन की अनुमति दी। 2 जनवरी को बीएसएफ ने ऊंचाई पर लोकेशन लेनी शुरू कर दी।
1 फरवरी को आईबी ने सीक्रेट नोट भेजा, जिसमें लिखा था कि चरार मार्केट में 125 विदेशी घूम रहे हैं। 10 दिन में यह दूसरी रिपोर्ट थी। इससे पहले 21 जनवरी को आईबी ने सूचना दी थी कि टाउन में कई पाकिस्तानी और अफगान आतंकी मौजूद हैं। ऐसे में केंद्र सरकार फौरन एक्शन चाहती थी लेकिन राजभवन ने वक्त लिया। गवर्नर केवी कृष्ण राव ने बाद में पीएम नरसिम्हा राव को बताया था कि रिपब्लिक डे परेड की तैयारियां चल रही थीं और श्रीनगर में व्यापक ऑपरेशन चल रहे थे जिससे आतंकी परेड और कार्यक्रम को न प्रभावित कर सकें।

मस्त गुल तो भाग निकला लेकिन

22 फरवरी को सेना ने गवर्नर को नोट भेजा। इधर लेफ्टिनेंट जनरल एमए जाकी ने राज्य के एडीजी (सीआईडी) से भी संपर्क किया। लेकिन देरी होती गई। 8 मार्च को बीएसएफ की एक टुकड़ी पर चरार के पास अटैक हुआ। आर्मी को पता था कि मस्त गुल हिज्बुल मुजाहिदीन के संपर्क में है। पाकिस्तान में बैठे आकाओं से मस्त गुल की बातचीत भी ट्रेस की गई। चरार कस्बे को चार बीएसएफ कंपनियों ने घेरकर रखा था। रणनीति ऐसी थी कि आतंकियों पर मानसिक दबाव बनाया जाए और उन्हें घेरकर थका दिया जाए। लेकिन रणनीति फेल हो गई।

मार्च में आतंकियों से इलाका छोड़ने को कहा गया कि उन्हें पाकिस्तान के सुपुर्द कर दिया जाएगा। लेकिन आतंकी नहीं गए। इसके बाद 19 मार्च को धारा 144 लगा दी गई। कस्बे में मीडिया और लोगों की एंट्री रोक दी गई। मकसद था कि गुल की पब्लिसिटी रुकेगी। कहा जाता है कि एक आतंकी को सेना ने छोड़ दिया जिससे वह गुल के साथ शांति की बात कर सके लेकिन उसका शव अगली सुबह लटका मिला।

11 मई की शाम सुरक्षाबलों की घेराबंदी तोड़ने के लिए आतंकियों ने फायरिंग की। अगली सुबह दहशतगर्दों ने दरगाह में आग लगा दी। देवदार की लकड़ी से बनी 700 साल पुरानी दरगाह जलने लगी। पूरा कस्बा जलकर तबाह हो गया। काफी लोगों ने हालात बिगड़ने के बाद पहले ही दूसरे इलाकों में शरण ले ली थी। सेना को आतंकियों के चंगुल से कस्बे को आजाद करने में एक महीने का वक्त लगा। 25 आतंकी मारे गए लेकिन मस्त गुल भाग निकला। काफी समय तक वह गायब रहा। कश्मीर में आतंकवाद के पोस्टर बॉय रहे मस्त गुल को बाद में हिजबुल ने विलेन घोषित कर दिया था। उसे निकाल दिया गया। 2001 में हिजबुल मुजाहिदीन ने उससे नाता तोड़ लिया।

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