झारखंड हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त फॉरेस्टर जय भगत की ग्रेच्युटी से काटी गई 9.54 लाख रुपये की राशि वापस करने में हो रही देरी पर राज्य सरकार के प्रति नाराजगी जताई है। कोर्ट ने अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं करने पर भी सवाल उठाए। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि 19 नवंबर तक उन अधिकारियों के नाम बताए जाएं, जिनकी वजह से भुगतान में देरी हुई है। ऐसा नहीं होने पर चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट की सैलरी से राशि काटने की कार्रवाई की जा सकती है। इससे पहले भी कोर्ट ने सरकार को जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि देरी के लिए जिम्मेदार अफसरों से विलंब अवधि का ब्याज वसूला जाएगा। इसके अलावा उनके गोपनीय सेवा रिकॉर्ड में भी इस संबंध में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज की जा सकती है। बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने शपथ पत्र दाखिल किया। सरकार ने बताया कि जय भगत को काटी गई राशि पर छह प्रतिशत ब्याज का भुगतान कर दिया गया है। हालांकि, 9.54 लाख रुपये की मूल राशि अब तक वापस नहीं की गई है। शपथ पत्र में अधिकारियों के बीच फाइलों के आगे बढ़ने की प्रक्रिया का विवरण दिया गया था। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की। अदालत ने इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताते हुए कहा कि इससे आदेश का अनुपालन साबित नहीं होता। फॉरेस्टर को उसकी मूल राशि नहीं मिलने के कारण कोर्ट के निर्देश का अब तक पालन नहीं हुआ है।
सरकार की ओर से अदालत से आदेश का अनुपालन करने के लिए 15 दिनों का अतिरिक्त समय मांगा गया। कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 19 नवंबर की तारीख तय की। साथ ही सरकार को तब तक जिम्मेदार अधिकारियों के नाम बताने को कहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश का पालन नहीं होने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने की। प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता अभिजीत आनंद ने पक्ष रखा। इससे पहले हाईकोर्ट ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक यानी पीसीसीएफ को भी निर्देश दिया था कि आदेशों की लगातार अनदेखी करने वाले अधिकारियों के गोपनीय सेवा अभिलेख में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करने पर विचार करें। कोर्ट ने कहा था कि ठोस कारण देने के बजाय बहाने बनाकर आदेशों का पालन नहीं करना गंभीर मामला है। यह विवाद जय भगत के खिलाफ हुई विभागीय कार्रवाई से जुड़ा है। कार्रवाई के बाद उनकी ग्रेच्युटी से 9.54 लाख रुपये काट लिए गए थे। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट की एकल पीठ में याचिका दायर की थी। एकल पीठ ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए काटी गई राशि लौटाने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए खंडपीठ में अपील की थी। खंडपीठ ने भी सरकार को मूल राशि के साथ छह प्रतिशत ब्याज देने का निर्देश दिया। इसके बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका यानी एसएलपी दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट से सरकार को राहत नहीं मिली और एकल पीठ का आदेश बरकरार रहा।



