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ठेकेदार भुगतान लंबित रखने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई.

दो सप्ताह में भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश जारी.

झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी कार्य पूरा होने के बावजूद लंबे समय तक भुगतान लंबित रखने के मामले को गंभीरता से लिया है। न्यायमूर्ति अनंदा सेन की एकलपीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के रवैये पर नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि कार्य पूरा होने के बाद भुगतान में अनावश्यक देरी उचित नहीं है। यह मामला अजोम मोटीवेट की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने भुगतान नहीं मिलने को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मामले के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से विचार किया। न्यायालय ने राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने को भी कहा गया। मामले की अगली सुनवाई छह अगस्त को निर्धारित की गई है। कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय समन्वय के मुद्दे पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि सरकारी संस्थाओं के बीच वित्तीय विवाद का असर किसी स्वतंत्र ठेकेदार पर नहीं पड़ना चाहिए। यदि किसी एजेंसी ने निर्धारित कार्य पूरा कर दिया है तो उसका भुगतान समय पर होना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि भुगतान रोककर रखना उचित प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने महाधिवक्ता से भी इस दिशा में पहल करने को कहा। न्यायालय ने सुझाव दिया कि संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर ऐसे मामलों का शीघ्र समाधान किया जाए। इससे ठेकेदारों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सरकारी भुगतान प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और समयबद्धता आवश्यक है। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनी गईं। न्यायालय ने मामले को गंभीर प्रशासनिक मुद्दे के रूप में देखा।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अफसर रजा ने पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि बोकारो में सोलर सिंचाई योजना से संबंधित कार्य लगभग तीन वर्ष पहले पूरा हो चुका है। इसके बावजूद अब तक भुगतान नहीं किया गया है। अधिवक्ता ने कहा कि यह स्थिति मनमानी और अनुचित है। उनका कहना था कि भुगतान लंबित रहने से याचिकाकर्ता के विधिक और संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। दूसरी ओर राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि यह योजना केंद्र सरकार से प्राप्त अनुदान पर आधारित थी। सरकार की ओर से कहा गया कि निधि उपलब्ध नहीं होने के कारण भुगतान नहीं हो सका। हालांकि न्यायालय ने भुगतान में हुई देरी को गंभीरता से लिया। अब सभी की नजरें अगली सुनवाई और अनुपालन रिपोर्ट पर टिकी हैं। हालांकि इस संबंध में मंत्री कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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