बिना किसी पिलर के तैयार हुए थे प्रगति मैदान के वो जालीदार हॉल जो बन गए ‘दिल्ली की खिड़की’
प्रगति मैदान स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ मनाने के लिए बनाया गया था। यह इस बात का प्रतीक था कि हम भारत में अपने दम पर क्या हासिल कर सकते हैं। 25 अप्रैल 2017 की शाम को जब इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन (आईटीपीओ) ने पुराने स्ट्रक्चर को ध्वस्त करना शुरू किया तो इसे बनाने वाले आर्किटेक्ट का दर्द फूट पड़ा था। इस वेन्यू का प्रबंधन आईटीपीओ ही करता है। 2018 से इसका रीडेवलपमेंट कार्य शुरू हो गया था। 3 नवंबर 1972 में इसके शुभारंभ के बाद से यह न जाने कितने आयोजनों का साक्षी रहा है। यह राजधानी दिल्ली की पहचान रहा है।
पांच स्ट्रक्चर थे पहचान
इस परिसर में कभी नेहरू पवेलियन, डिफेंस पवेलियन, इंदिरा पवेलियन और सन ऑफ इंडिया पवेलियन जैसे कई पवेलियन होते थे। कुल मिलाकर इसमें पांच स्ट्रक्चर थे। एक हॉल ऑफ नेशंस और चार हॉल ऑफ इंडस्ट्रीज। 1972 में हॉल ऑफ नेशंस एंड इंडस्ट्रीज नव-स्वतंत्र भारत में युवा वास्तुकारों की उपलब्धि का प्रतीक था। इन युवा आर्किटेक्ट ने खास शैली से इसका निर्माण किया था। इसमें सीमित साधनों का इस्तेमाल हुआ था। फिर भी यह विशिष्ट रूप से भारतीय था। हर साल यह प्रगति मैदान 70 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों की मेजबानी करता रहा है।
इंदिरा गांधी ने किया था उद्घाटन
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसका उद्घाटन किया था। हॉल ऑफ नेशंस जल्द ही दिल्ली में सांस्कृतिक मील का पत्थर बन गया। इसकी भव्य ‘जाली’ जैसी संरचना शहर के गतिशील विकास की पृष्ठभूमि थी। इसके निर्माण के बाद प्रगति मैदान में हॉल ऑफ नेशंस दुनिया में बिना पिलर वाला अपनी तरह का पहला कंक्रीट स्ट्रक्चर था। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। इसने विश्व मंच पर भारत की पहचान बनाई थी।
तब अलग तरह का देश था भारत
आजादी के 25 साल बाद देश मानव श्रम पर बहुत ज्यादा निर्भर था। मशीनों की भूमिका न के बराबर थी। लिहाजा, हॉल ऑफ नेशंस का निर्माण करते समय वास्तुकला में आधुनिक सौंदर्य का नमूना पेश करना चुनौती थी। इसके आर्किटेक्ट का नाम था राजू रेवाल। स्ट्रक्चरल इंजीनियर थे महेंद्र राज। देश की ज्यादातर इमारतों को आकार देने के पीछे इस जोड़ी का हाथ रहा है। इंडियन मॉडर्निटी नाम की डॉक्यूमेंट्री में इन्होंने बताया है कि किस तरह प्रगति मैदान को खड़ा किया गया।




