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ऐसी जगह, जहां साल के पहले दिन की शुरुआत होती है आंसुओं से, जानें आजाद भारत की सबसे पहली दर्दनाक घटना की अनकही कहानी

1 जनवरी को जब देश-दुनिया में लोग जश्न मनाते हैं, उस दिन खरसावां अपनों की कुर्बानी के लिए आंसू बहाता है। आज से 75 साल पहले खरसावां गोलीकांड में सैकड़ों बेगुनाह लोगों की जान चली गई थी। खरसावां गोली ने एक बार फिर से जालियांवाला बाग हत्याकांड की याद दिला दी थी। इस गोलीकांड में सैकड़ों लोगों की खून से खरसावां का हाट मैदान लाल हो गया था। हालांकि आज तक इस गोलीकांड में हुई मौत का सही आंकड़ा नहीं पता चल सका। बताया जाता है कि मारे गए लोगों के शवों को खरसावां हाट मैदान स्थित एक कुएं में भर कर मिट्टी से पाट दिया गया था। इस स्थल को अब शहीद बेदी और हाट मैदान शहीद पार्क से जाना जाता हैं।

खरसावां और सरायकेला रियासत का ओडिशा में विलय का विरोध

दरअसल 1947 में आजादी के बाद पूरा देश राज्यों के पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा था। उस वक्त अनौपचारिक रूप से 14-15 दिसंबर को ही खरसावां और सरायकेला रियासतों का ओडिशा में विलय का समझौता हो चुका था। यह फैसला रियासतों के राज परिवार की सहमति से लिया गया। लेकिन आसपास के सैकड़ों गांव के लोग इस फैसले का विरोध कर रहे थे। 1 जनवरी 1948 को यह समझौता लागू होना था। उस वक्त के सबसे बड़े आदिवासी नेता जयपाल सिंह ने इस फैसले का विरोध किया। खरसावां और सरायकेला के ओडिशा में विलय के विरोध में जयपाल सिंह ने 1 जनवरी 1948 को ही खरसावां हाट मैदान में जनसभा का आह्वान किया। वे खुद इस जनसभा में नहीं पहुंचे, लेकिन बड़ी संख्या में कोल्हान समेत कई इलाकों के हजारों लोग पैदल चलकर खरसावां हाट मैदान पहुंच गए।

निहत्थे आदिवासियों, महिलाओं और बच्चों को बनाया निशाना

रैली को लेकर पर्याप्त संख्या में पुलिस बल और अर्द्धसैन्य बलों की तैनाती की गई थी। इसी दौरान जनसभा में पहुंचे लोग और सुरक्षा बलों के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। इसके बाद वहां पर गोलियां चलाई गई। इसमें पुलिस की गोलियों से सैकड़ों लोगों की जान चली गई। उस वक्त के प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने खरसावां गोलीकांड की तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से कर डाली।

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