झारखंड हाईकोर्ट ने खनन से जुड़े दो मामलों में करीब 2.42 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि लौटाने की मांग खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2017 में जारी मांग नोटिस को उस समय चुनौती नहीं दी थी। दोनों ने मांग के अनुसार राशि जमा कर दी थी। इसके बाद उन्होंने करीब नौ वर्षों तक इस मामले में कोई कानूनी कदम नहीं उठाया। वर्ष 2025 में समान मामलों में राहत मिलने के बाद उन्होंने जमा राशि वापस मांगनी शुरू की। हाईकोर्ट ने ऐसे याचिकाकर्ताओं को कानून की भाषा में फेंस सिटर माना। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने की। याचिका विजय कुमार ओझा और अनिल खिरवाल ने दायर की थी। दोनों ने जमा मुआवजा राशि ब्याज सहित वापस करने की मांग की थी। अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए उनकी मांग पर राहत देने से इनकार कर दिया।
मामला पश्चिमी सिंहभूम के जिला खनन पदाधिकारी की वर्ष 2017 की मांग से जुड़ा था। मांग Mines and Minerals Development and Regulation Act की धारा 21(5) के तहत की गई थी। विजय कुमार ओझा से 33,60,863 रुपये जमा करने को कहा गया था। अनिल खिरवाल से 2,08,39,666 रुपये की मुआवजा राशि मांगी गई थी। आरोप था कि निर्धारित पर्यावरणीय सीमा से अधिक अयस्क का खनन किया गया। दोनों याचिकाकर्ताओं ने 30 दिसंबर 2017 को मांगी गई राशि जमा कर दी थी। उनका कहना था कि जिला खनन पदाधिकारी को धारा 21(5) के तहत ऐसी मांग करने का अधिकार नहीं था। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य सरकार ने धारा 26(2) के तहत यह शक्ति उन्हें नहीं दी थी। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के 4 मार्च 2025 के फैसले का भी हवाला दिया। उस फैसले में समान मामलों में मांग नोटिस रद्द कर जमा राशि वापस करने का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि 2025 के फैसले को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की एसएलपी भी 15 दिसंबर 2025 को खारिज हो चुकी है। इसी आधार पर उन्होंने अपनी राशि ब्याज सहित लौटाने की मांग रखी थी। खंडपीठ ने कहा कि मौजूदा मामलों में 2017 के मांग नोटिस को कभी चुनौती नहीं दी गई। अदालत के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने राशि जमा करने के बाद लंबे समय तक निष्क्रियता बनाए रखी। वर्ष 2025 में दूसरे खनन पट्टाधारकों को राहत मिलने के बाद उन्होंने रिफंड के लिए अभ्यावेदन दिए। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अधिकारविहीन अधिकारी का नोटिस शून्य था। इसलिए उनके अनुसार उसे अलग से चुनौती देना जरूरी नहीं था। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। खंडपीठ ने कहा कि जिन मामलों का हवाला दिया गया, उनमें पक्षकारों ने समय रहते अदालत का दरवाजा खटखटाया था। वर्तमान मामलों में ऐसी तत्परता नहीं दिखाई गई। इसलिए अदालत ने असाधारण रिट क्षेत्राधिकार के तहत दोनों याचिकाओं में राहत देने से इनकार कर दिया।


