रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 14 मई 2024 के सर्कुलर को चुनौती दी गई है। याचिका में सर्कुलर को कानूनी रूप से गलत बताया गया है। मामला हिरासत में मौत और दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सर्कुलर के कारण न्यायिक जांच की बाध्यता समाप्त कर दी गई है। इसे कानून की मूल भावना के विपरीत बताया गया है। याचिका में न्यायालय से उचित हस्तक्षेप की मांग की गई है। इस मामले ने कानूनी हलकों में चर्चा शुरू कर दी है। जनहित याचिका के माध्यम से सर्कुलर की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। अब मामले पर न्यायालय में सुनवाई होगी।
यह जनहित याचिका मो. मुमताज अंसारी की ओर से दायर की गई है। उनकी ओर से अधिवक्ता शादाब अंसारी ने पक्ष रखा है। याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सर्कुलर में कानूनी प्रावधानों की गलत व्याख्या की गई है। इसमें आयोग के अध्यक्ष की पीठ द्वारा भारतीय न्याय संहिता की दो अलग-अलग धाराओं को एक साथ जोड़ने की बात कही गई है। याचिका के अनुसार धारा 194(4) और धारा 196(2) का उद्देश्य अलग-अलग है। दोनों धाराओं के प्रावधानों में स्पष्ट अंतर बताया गया है। इसी आधार पर सर्कुलर को चुनौती दी गई है। याचिका में इस त्रुटि को सुधारने की मांग भी की गई है। अधिवक्ता ने न्यायालय से मामले पर विचार करने का अनुरोध किया है। मामला अब न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है।
याचिका में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 194(4) कार्यपालक दंडाधिकारी को प्रारंभिक जांच का अधिकार देती है। वहीं धारा 196(2) न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा विस्तृत न्यायिक जांच का प्रावधान करती है। दोनों प्रक्रियाओं का उद्देश्य अलग-अलग बताया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन्हें एक समान नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर सर्कुलर को कानून के अनुरूप नहीं बताया गया है। याचिका में सर्कुलर को निरस्त करने की मांग की गई है। मामले पर हाईकोर्ट का निर्णय आने के बाद स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल न्यायालय में सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। कानूनी विशेषज्ञ भी इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय आगे का निर्णय देगा।



