इस प्रस्ताव का उद्देश्य राज्यों को अधिक अधिकार दिलाना है।
प्रस्ताव में केंद्र सरकार से राज्यों के संघीय अधिकार सुनिश्चित करने की मांग की जाएगी।
यह प्रस्ताव तमिलनाडु में राज्य अधिकारों को लेकर लंबे समय से जारी आवाज का हिस्सा है।
इससे पहले 1974 में दिवंगत मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित कराया था।
डीएमके सरकार का यह कदम केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध के तौर पर देखा जा रहा है।
विधानसभा में इससे पहले केंद्र के वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ भी प्रस्ताव पारित हो चुका है।
तमिलनाडु विधानसभा ने उस कानून को वापस लेने की मांग की थी।
राज्य सरकार का कहना है कि केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों में कटौती कर रही है।
प्रस्ताव के जरिए केंद्र को यह संदेश देना है कि राज्य अपने अधिकारों से समझौता नहीं करेंगे।
डीएमके हमेशा से संघीय ढांचे को मजबूत करने की वकालत करती आई है।
मुख्यमंत्री स्टालिन का मानना है कि राज्यों को शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था में अधिक स्वायत्तता मिलनी चाहिए।
राज्य सरकार के अनुसार, केंद्र द्वारा थोपे गए फैसलों से राज्यों का विकास प्रभावित हो रहा है।
प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र के एकतरफा फैसलों पर सवाल खड़े किए जाएंगे।
कई विपक्षी दल भी राज्य अधिकारों की इस मांग का समर्थन कर सकते हैं।
विधानसभा में बहुमत के चलते प्रस्ताव के पारित होने की संभावना है।
स्टालिन पहले भी कई बार केंद्र की आर्थिक और नीतिगत नीतियों की आलोचना कर चुके हैं।
प्रस्ताव पारित होने पर इसे केंद्र सरकार को औपचारिक रूप से भेजा जाएगा।
यह प्रस्ताव एक बार फिर राज्यों और केंद्र के बीच अधिकारों को लेकर बहस छेड़ सकता है।



