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गोरखपुर स्टेशन पर MLA रविंद्र सिंह की हत्या, जिसने पूर्वांचल की राजनीति का रक्तचरित्र ही बदल दिया

उत्तर प्रदेश का गोरखपुर से ही देश की सियासत में पहली बार अपराधीकरण की शुरुआत हुई। दरअसल 70 के दशक में इमरजेंसी का दौर था। देश में जेपी आंदोलन सियासत के नए चेहरे जन्म दे रहा था। इस आंदोलन से कई युवा प्रभावित हुए और छात्र राजनीति में कूद पड़े। इसी दौर में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में हरिशंकर तिवारी और बलवंत सिंह छात्रनेता हुए। दोनों में ही वर्चस्व को लेकर जंग चल रही थी। खास बात ये थी कि इन्होंने छात्र राजनीति में जातिवाद का प्रयोग शुरू कर दिया था। बलवंत सिंह जहां ठाकुर लॉबी को जोड़ने में जुटे थे, वहीं दूसरी तरफ हरिशंकर तिवारी ब्राह्मण युवाओं को अपनी तरफ जोड़ने की कोशिश करते।

इसी दौर में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में वीरेंद्र प्रताप शाही की एंट्री होती है। वीरेंद्र प्रताप शाही इससे पहले बस्ती में रहा करते थे और वहां के पूर्व विधायक राम किंकर सिंह के करीबी माने जाते थे। लेकिन बाद में राम किंकर से संबंध खराब हो गए और बस्ती छोड़कर वीरेंद्र शाही गोरखपुर आ गए। इसी दौर में बलवंत सिंह और वीरेंद्र शाही की नजदीकी बढ़ने लगी। दोनों ही ठाकुर थे और जिले में ठाकुरों के वर्चस्व कायम करने में जुट गए।

लेकिन इसी बीच 1978 में बलवंत सिंह की हत्या हो गई। आरोप लगा कि हत्या उसके करीबी दोस्त रुदल प्रताप सिंह ने की, जो हरिशंकर तिवारी का भी करीबी बताया गया। इस हत्याकांड के बाद वीरेंद्र शाही ने मोर्चा संभाला और बलवंत की हत्या के लिए हरिशंकर तिवारी के खिलाफ कैंट थाने में केस दर्ज करवा दिया। इस केस के बाद से ही शाही और तिवारी गैंग में गैंगवार की शुरुआत मानी जाती है।

इसके बाद हरिशंकर तिवारी के करीबी मृत्युंजय दुबे की वीरेंद्र शाही से झड़प के दौरान पैर में गोली लगने की खबर आती है। बाद में मृत्युंजय की गैंगरीन के कारण मौत हो जाती है। इसके बाद वीरेंद्र शाही को खबर मिलती है कि उनके करीबी बेचई पांडेय की गगहा में हत्या हो गई है। शाही के समर्थक डेडबॉडी लेकर लौटते हैं तो इसी दौरान हरिशंकर तिवारी के तीन करीबी लोग रास्ते में मिल जाते हैं। इन तीनों की हत्या हो जाती है। इसके बाद शाही गैंग के सदस्यों की हत्या होती है और गैंगवॉर का सिलसिला चल निकलता है।

ये वो दौर था जब पूर्वांचल की राजनीति में एक और युवा अपनी तेजी से अपनी पहचान बना रहा था। नाम था रविंद्र सिंह। रविंद्र सिंह 1967 में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे। इसके बाद 1972 में लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे। तेज तर्रार छवि के रविंद्र सिंह ने देखते ही देखते गोरखपुर और आसपास के इलाकों में अपनी अच्छी पहचान बना ली थी। इसी को देखते हुए उन्हें जनता पार्टी ने 1977 में टिकट दिया। अपने पहले ही चुनाव में रविंद्र सिंह कौड़ीराम सीट से विधायक चुने गए। कहा जाता है कि रविंद्र सिंह की वीरेंद्र शाही से करीबी थी, वीरेंद्र धीरे-धीरे रविंद्र सिंह से ही राजनीति के गुर सीख रहे थे। लेकिन तभी रविंद्र सिंह की गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर हत्या हो जाती है। उन्हें गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर गोलियों से भून दिया जाता है।ये वो घटना थी, जिसने छात्र राजनीति में जातिवाद के जहर को अब गोरखपुर सहित आसपास के तमाम जिलों में फैला दिया। जातीय जंग का ऐसा बीज बोया गया कि पूर्वांचल में कई दबंग,अपराधी, छात्रनेता और निर्दोष मारे गए। रविंद्र सिंह की हत्या के बाद वीरेंद्र शाही ठाकुरों के नेता बनकर उभरे। इसी दौरान 1980 में महाराजगंज की लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट पर चुनाव हुए और वीरेंद्र शाही ने निर्दलीय पर्चा दाखिल कर दिया। उन्हें चुनाव आयोग की तरफ से शेर चुनाव निशान मिला। वीरेंद्र शाही ने इस चुनाव में जीत दर्ज की और यहीं से उनको शेर-ए-पूर्वांचल कहा जाने लगा। खास बात ये थी 1980 के इस चुनाव में वीरेंद्र शाही ने अमर मणि त्रिपाठी को मात दी। वही अमर मणि त्रिपाठी जो हरिशंकर तिवारी को अपना राजनीतिक गुरू मानते थे। 1989 में विधायक बने और बाद में मधुमिता हत्याकांड में सजायाफ्ता हुए।एक तरफ वीरेंद्र शाही की ताकत बढ़ रही थी वहीं दूसरी तरफ हरिशंकर तिवारी भी 1985 में जेल से चुनाव जीतने वाले निर्दलीय विधायक बन गए। दोनों ही अब तक रेलवे के ठेके के धंधे में उतर चुके थे। यहां भी वर्चस्व की जंग शुरू हो गई। वर्चस्व की ये जंग 1997 तक जारी रही। ये वो साल था जब पूर्वांचल की आपराधिक दुनिया में एक नए नाम का उदय हुआ श्रीप्रकाश शुक्ला। श्रीप्रकाश शुक्ला ने लखनऊ में वीरेंद्र शाही की हत्या कर दी। कहा जाता है कि हरिशंकर तिवारी भी श्रीप्रकाश शुक्ला की हिटलिस्ट में थे लेकिन शुक्ला का जैसे उदय हुआ, वैसे ही अंत भी हो गया।

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