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नीतीश की विपक्षी एकता का ‘अंकगणित’ बिगाड़ देंगे अरविंद केजरीवाल! ‘दिल्ली सेवा बिल’ का साइड इफेक्ट समझिए

दिल्ली के सीएम और आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल को दिल्ली सेवा बिल पर संसद में मुंह की खानी पड़ी है। उनकी सारी योजनाएं धराशायी हो गईं। उन्होंने राज्यसभा में विपक्षी आंकड़ों का जो अंकगणित बनाया था, वह गलत साबित हुआ। दो विपक्षी दलों- बीजू जनता दल (बीजेडी) और आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस ने बिल पर राज्यसभा में सत्ताधारी एनडीए का साथ दिया। हालांकि इसकी संभावना तब से ही पुख्ता हो गई थी, जब बिल पर लोकसभा में दोनों दलों ने एनडीए के साथ खड़ा होने की घोषणा की। अरविंद केजरीवाल की पार्टी (AAP) और कांग्रेस की पंजाब और दिल्ली इकाइयों के नेताओं में पहले से ही खींचतान रही है। दोनों इकाइयां विपक्षी एकता के नाम पर आम आदमी पार्टी से किसी तरह के समझौते के पक्ष में नहीं रही हैं। केजरीवाल भी बार-बार धमका रहे थे कि उन्हें बिल पर विपक्ष ने साथ नहीं दिया तो वे गठबंधन से अलग रह सकते हैं। ऐसा उन्होंने घोषित तौर पर तो नहीं कहा था, लेकिन उनके इशारे इसी बात की पुष्टि कर रहे थे।

पटना बैठक में भी बिल पर समर्थन की रखी थी शर्त

अरविंद केजरीवाल दिल्ली सेवा बिल के खिलाफ विपक्ष को अपने स्तर से एकजुट करने का प्रयास कर रहे थे। बारी-बारी से उन्होंने विपक्षी नेताओं से खुद मुलाकात की थी। पटना में 23 जून को हुई विपक्षी बैठक की पूर्व संध्या पर उन्होंने एक पत्र भी जारी किया था, जिसमें विपक्ष के समर्थन की जरूरत उन्होंने बताई थी। उन्होंने कहा था कि आज दिल्ली के साथ ऐसा हो रहा है तो कल दूसरे गैर एनडीए शासित राज्यों में भी ऐसा ही होगा। इसलिए विपक्षी बैठक में सबसे पहले इसी एजेंडे पर बात होनी चाहिए। हालांकि बैठक में इस पर कोई चर्चा नहीं हुई और नाराज होकर वे बैठक से निकल कर दिल्ली रवाना हो गए थे। उन्होंने ज्वाइंट प्रेस कांफ्रेंस में रहना भी मुनासिब नहीं समझा।

संसद सत्र शुरू होने के ठीक पहले कांग्रेस हुई थी राजी

संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने के 24 घंटे पहले कांग्रेस ने अरविंद केजरीवाल को बिल पर साथ देने का आश्वासन दिया। इसके पहले कांग्रेस नेताओं मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से मिलने का वे समय मांगते रहे, लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। इससे केजरीवाल की नाराजगी भी झलक रही थी। उनकी पार्टी के सीनियर लीडर धमकी भी देते रहे कि बिल पर कांग्रेस ने साथ नहीं दिया तो वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के आसन्न विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ अपने उम्मीदवार भी उतारेंगे। बिल पर साथ देने की कांग्रेस के हामी भरने के बाद आप (AAP) नेताओं के सुर बदले। राज्यसभा में बिल पेश होने के पहले आप की ओर से बयान आया कि मध्य प्रदेश और गुजरात में पार्टी कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ेगी।

AAP का राष्ट्रव्यापी विस्तार अरविंद का सपना रहा है

दिल्ली में कामयाबी के साथ ही आम आदमी पार्टी ने देश भर में विस्तार का सपना देखा था। ज्यादातर राज्यों में आप ने सांगठनिक ढांचा भी खड़ा कर लिया है। पंजाब में उसे कामयाबी भी मिल गई। गुजरात में भी पार्टी ने पूरे दमखम से चुनाव लड़ा। हालांकि इसका नुकसान आप और कांग्रेस दोनों को हुआ। विपक्षी वोट बंट गए और बीजेपी ने बाजी मार ली। विपक्षी एकता की बातचीत जब से शुरू हुई, तब से कई बार आम आदमी पार्टी का स्टैंड बदला। कभी किसी गठबंधन में शामिल न होने की बात उसके नेता करते रहे तो कभी अकेले चुनाव मैदान में उतरने का संकेत देते रहे। कभी विपक्ष का साथ देने के लिए दिल्ली और पंजाब को आप के लिए मैदान खाली करने की शर्त भी रखी गई। खैर, ये तमाम बयानबाजी सिर्फ दिल्ली सेवा बिल पर विपक्ष, खासकर कांग्रेस का समर्थन हासिल करने के लिए थी। आखिरकार कांग्रेस ने उनका साथ तो दिया, लेकिन इसका कोई सुखद परिणाम सामने नहीं आया। राज्यसभा में बिल के पक्ष में 131 वोट पड़े, जबकि विपक्ष में सिर्फ 102 वोट ही आए।

सेवा बिल पर गड़बड़ा गया केजरीवाल का अंक गणित

शरद पवार, ममता बनर्जी, अखिलेश, नीतीश और हेमंत सोरेन से अरविंद केजरीवाल ने बिल पर समर्थन के लिए मुलाकात की थी। कांग्रेस भी बाद में तैयार हो गई थी। केजरीवाल की कोशिश थी कि लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकजुटता की अग्निपरीक्षा राज्यसभा में हो सकती है। दिल्ली में ट्रांसफर-पोस्टिंग का अधिकार एलजी से छीन कर राज्य सरकार को दिये जाने के बाद केंद्र सरकार ने अध्यादेश जारी कर दिया था। कानून बनाने के लिए विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में पास करना होता है। लोकसभा में तो एनडीए स्पष्ट बहुमत में है, इसलिए वहां बिल पास होने में कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन राज्यसभा में विपक्षी सदस्यों की अधिकता के कारण केजरीवाल को उम्मीद थी कि वहां बिल पास नहीं हो पाएगा। दरअसल राज्यसभा में कुल सदस्यों की संख्या 245 है। इसमें बीजेपी के 95 सदस्य हैं। बहुमत के लिए 123 सदस्यों का समर्थन जरूरी था। केजरीवाल को उम्मीद थी कि अगर विपक्ष एकजुट रहा तो राज्यसभा में सरकार को मुंह की खानी पड़ेगी।

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