झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जेल क्लर्क महेंद्र राम की बर्खास्तगी से जुड़े मामले में अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली है। अदालत ने उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। हालांकि, सजा की मात्रा पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। इसके लिए मामला अपीलीय प्राधिकारी के पास वापस भेजा गया है। महेंद्र राम पर जेल में सामान खरीदने के दौरान अधिक भुगतान और स्टॉक रजिस्टर में गड़बड़ी के आरोप लगे थे। वह 1983 में हजारीबाग केंद्रीय जेल में सिपाही नियुक्त हुए थे। वर्ष 1999 में उन्हें क्लर्क बनाया गया था। 2013 में उनका तबादला गोड्डा मंडल कारा में हुआ था। वहां उन्हें सहायक अधीक्षक का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया था। दुमका केंद्रीय जेल के अधीक्षक की जांच में वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया था। जांच के अनुसार, अप्रैल और मई 2013 में मेसर्स साहेब ट्रेडर्स को कुल 5,81,443 रुपये का अधिक भुगतान किया गया था। इसमें अप्रैल का भुगतान 3,38,878 रुपये और मई का भुगतान 2,42,565 रुपये बताया गया था। जून 2013 में मेसर्स इशरत एंटरप्राइजेज को भी 62,336 रुपये अधिक दिए गए थे। मार्च 2016 में महेंद्र राम को निलंबित कर आरोप-पत्र दिया गया था। विभागीय जांच के बाद 28 नवंबर 2016 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
महेंद्र राम ने बर्खास्तगी के खिलाफ विभागीय अपील की थी, जिसे 2019 में खारिज कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। वर्ष 2022 में एकल पीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसी फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने खंडपीठ में अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान उनकी ओर से अधिवक्ता शिल्पी गाड़ोदिया ने पक्ष रखा था। उन्होंने बताया कि इसी मामले में इन-चार्ज अधीक्षक को विभागीय कार्यवाही में दोषमुक्त कर दिया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित दोनों कंपनियों ने अधिक भुगतान की राशि वापस कर दी थी। बचाव पक्ष ने बर्खास्तगी को आरोपों के अनुपात में अत्यधिक कठोर बताया था। राज्य की ओर से एएजी-III आशुतोष आनंद ने विभागीय जांच का समर्थन किया था। उन्होंने कहा कि जांच में कोई प्रक्रियागत खामी नहीं थी और महेंद्र राम को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिला था। राज्य की ओर से स्टॉक रजिस्टर में कटिंग, ओवरराइटिंग और व्हाइटनर के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया था। अदालत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा में जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता देखी जाती है, न कि साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन किया जाता है। पीठ ने पाया कि विभागीय जांच में कोई गंभीर खामी नहीं थी और अपीलकर्ता को सुनवाई का पूरा अवसर मिला था। ब्लैकलिस्ट की गई फर्म को भुगतान और रजिस्टर में छेड़छाड़ के आधार पर अदालत ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप नहीं किया। हालांकि, सजा तय करने के मामले में अदालत ने अलग दृष्टिकोण अपनाया। पीठ ने कहा कि मामले में इन-चार्ज अधीक्षक की भूमिका भी बताई गई थी, जिन्हें बाद में दोषमुक्त कर दिया गया था। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि जून 2013 में साहेब ट्रेडर्स को अधिक भुगतान के बजाय कम भुगतान हुआ था। दोनों कंपनियों ने अधिक भुगतान की रकम वापस कर दी थी, लेकिन अनुशासनिक और अपीलीय प्राधिकारी ने इन पहलुओं पर विचार नहीं किया था। 23 अक्टूबर 2019 के अपीलीय आदेश में सजा की मात्रा पर कोई चर्चा नहीं की गई थी। हाईकोर्ट ने एकल पीठ के फैसले का सजा की मात्रा को सही ठहराने वाला हिस्सा रद्द कर दिया। मामला गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अपर मुख्य सचिव के पास वापस भेज दिया गया है। अपीलीय प्राधिकारी को अदालत की टिप्पणियों पर विचार करते हुए छह सप्ताह के भीतर सजा की मात्रा पर नया निर्णय लेना होगा।



